ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन पर ₹1,970 करोड़ का घाटा, 2026-27 में देनदारी ₹3,434 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान
सारांश
मुख्य बातें
ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन (जीसीसी) वित्त वर्ष 2025-26 में गहराते राजकोषीय संकट से घिर गया है, जहाँ कुल घाटा ₹1,763 करोड़ तक जा पहुँचा है और ऋण के मूलधन के पुनर्भुगतान को जोड़ने पर यह आँकड़ा ₹1,970 करोड़ हो जाता है। अधिकारियों के अनुसार, रेवेन्यू कलेक्शन में सापेक्षिक स्थिरता के बावजूद खर्च तेज़ रफ़्तार से बढ़ रहा है, जिससे निकाय की भुगतान क्षमता पर गंभीर दबाव बन रहा है।
खर्च में उछाल: तीन वर्षों में ₹2,000 करोड़ से अधिक की बढ़ोतरी
जीसीसी का रेवेन्यू खर्च 2022-23 में ₹3,581 करोड़ था, जो 2025-26 में बढ़कर ₹5,676 करोड़ हो गया — यानी तीन वर्षों में ₹2,095 करोड़ की वृद्धि। अधिकारियों ने इस उछाल के लिए सफाई सेवाओं की बढ़ी लागत, डिज़ाइन बिल्ड फाइनेंस ऑपरेट ट्रांसफर (DBFOT) मॉडल पर आधारित सार्वजनिक सुविधाओं के संचालन, वाहन किराए, वेतन संशोधन और नवनिर्मित स्कूलों व नागरिक अवसंरचना के रखरखाव को जिम्मेदार ठहराया है।
यह ऐसे समय में आया है जब शहरी निकायों पर सेवा विस्तार का दबाव लगातार बढ़ रहा है, जबकि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर पूँजीगत अनुदान में कटौती हो रही है।
कैपिटल ग्रांट में भारी गिरावट, आंतरिक संसाधनों पर निर्भरता बढ़ी
विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली कैपिटल ग्रांट सहायता 2022-23 में ₹1,941 करोड़ थी, जो 2025-26 में घटकर महज ₹521 करोड़ रह गई — यानी तीन वर्षों में 73% से अधिक की गिरावट। बाहरी फंडिंग में इस तीव्र कमी ने जीसीसी को बुनियादी ढाँचे और विकास कार्यों के लिए अपने आंतरिक संसाधनों पर निर्भर होने पर मजबूर किया है।
इस अंतर को पाटने के लिए निकाय ने रेवेन्यू अकाउंट से कैपिटल अकाउंट में फंड ट्रांसफर का सहारा लिया है। यह आंतरिक ट्रांसफर 2022-23 में ₹303 करोड़ था, जो 2025-26 में बढ़कर ₹937 करोड़ हो गया। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस आंतरिक वित्तपोषण पर लगातार निर्भरता ने निकाय की तरलता (लिक्विडिटी) पर भारी दबाव डाला है।
बकाया देनदारियाँ: 2026-27 में ₹3,434 करोड़ का बोझ
29 जुलाई 2025 तक जीसीसी के बकाया अदत्त बिलों की राशि ₹1,929.72 करोड़ थी। चालू वित्त वर्ष में लगभग ₹1,505 करोड़ के अतिरिक्त बिल आने का अनुमान है, जिससे 2026-27 के लिए कुल देनदारी ₹3,434.72 करोड़ तक पहुँच सकती है। गौरतलब है कि यह राशि किसी एकल नगर निकाय के लिए असाधारण रूप से बड़ी है और वित्तीय प्रबंधन के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करती है।
संकट से उबरने के उपाय: टैक्स अभियान और राज्य सहायता की माँग
कॉर्पोरेशन कमिश्नर ने नकदी प्रवाह की दैनिक समीक्षा शुरू कर दी है और ज़रूरी भुगतानों को प्राथमिकता दी जा रही है। जुलाई में शुरू किए गए विशेष प्रॉपर्टी टैक्स कलेक्शन अभियान के उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं — पहले 27 दिनों में ₹158.18 करोड़ का संग्रह हुआ, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह केवल ₹61.55 करोड़ था।
इसके अलावा, जीसीसी टैक्स चोरी का पता लगाने के लिए डेटा मैपिंग कर रही है, कम आंकी गई संपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन कर रही है और एसेट मॉनेटाइजेशन के अवसर तलाश रही है। तत्काल नकदी की जरूरत को पूरा करने के लिए राज्य सरकार से 'वेज एंड मीन्स एडवांस' और स्टाम्प ड्यूटी सरचार्ज की दो तिमाहियों की अग्रिम राशि जारी करने की माँग की गई है।
आगे की राह: सुधार या संरचनात्मक संकट?
विशेषज्ञों के अनुसार, जीसीसी की मौजूदा स्थिति केवल अल्पकालिक नकदी की कमी नहीं, बल्कि एक गहरे संरचनात्मक असंतुलन का संकेत है — जहाँ खर्च की गति आय से कहीं आगे निकल चुकी है और बाहरी अनुदान पर निर्भरता घट रही है। यदि राज्य सरकार शीघ्र वित्तीय सहायता नहीं देती और राजस्व संग्रह में सुधार की गति बनी नहीं रहती, तो नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होने का जोखिम बना रहेगा।