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गिर के 500 एशियाई शेरों को कृमिनाशक दवा दी गई, 8 मौतों के बाद स्थिति नियंत्रण में: मोढवाडिया

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गिर के 500 एशियाई शेरों को कृमिनाशक दवा दी गई, 8 मौतों के बाद स्थिति नियंत्रण में: मोढवाडिया

सारांश

गिर में संक्रमण से 8 शेरों की मौत के बाद गुजरात वन विभाग ने 500 एशियाई शेरों को कृमिनाशक दवा दी। शुरुआती जाँच में बेबेसियोसिस का संकेत, 2018 जैसे प्रकोप की आशंका। मंत्री मोढवाडिया ने कहा — तीन दिनों में कोई नई मौत नहीं, स्थिति नियंत्रण में।

मुख्य बातें

गुजरात वन विभाग ने गिर परिक्षेत्र में लगभग 500 एशियाई शेरों को कृमिनाशक (डीवॉर्मिंग) दवा दी।
संदिग्ध संक्रमण से अब तक 8 शेरों की मौत; पिछले तीन दिनों में कोई नई मौत नहीं।
शुरुआती जाँच में बेबेसियोसिस (परजीवी रोग) का संकेत; आधिकारिक लैब पुष्टि गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर से अपेक्षित।
मौतें गिर सोमनाथ के गिर गढ़डा और अमरेली के बाबरिया — अभयारण्य सीमा के बाहर के क्षेत्रों से।
फिलहाल 17 शेर निगरानी में; प्रभावित क्षेत्र के 10 किलोमीटर दायरे में शेरों को अलग किया गया।
गुजरात में एशियाई शेरों की आबादी 2025 जनगणना के अनुसार 891 तक पहुँची।

गुजरात के वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने 31 मई 2026 को बताया कि गिर परिक्षेत्र में संदिग्ध संक्रमण से 8 एशियाई शेरों की मौत के बाद राज्य के वन विभाग ने लगभग 500 शेरों को कृमिनाशक (डीवॉर्मिंग) दवा दे दी है। मंत्री ने प्रभावित क्षेत्रों का व्यक्तिगत दौरा करने के बाद पुष्टि की कि पिछले तीन दिनों में संक्रमण से जुड़ी कोई नई मौत दर्ज नहीं हुई है।

मुख्य घटनाक्रम

मोढवाडिया ने जामवाला रेस्क्यू सेंटर, बाबरिया जंगल एरिया और जसाधर एनिमल केयर सेंटर का ऑन-ग्राउंड निरीक्षण किया, जहाँ पशु चिकित्सकों की टीमें बीमारी के लक्षण दिखाने वाले शेरों पर नज़र रख रही हैं। फिलहाल 17 शेर विभिन्न स्थानों पर निगरानी में हैं।

मौतें गिर सोमनाथ जिले के गिर गढ़डा और अमरेली जिले के बाबरिया इलाके से रिपोर्ट की गईं — दोनों ही संरक्षित गिर अभयारण्य की सीमाओं के बाहर के क्षेत्र हैं। वन अधिकारियों ने प्रभावित स्थानों के 10 किलोमीटर के दायरे में शेरों को अलग कर दिया है और बड़े पैमाने पर एंटी-टिक व निगरानी अभियान शुरू किए हैं।

बचाव उपाय और प्रारंभिक कार्रवाई

मंत्री के अनुसार वन अधिकारियों ने 19 मई से ही एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए थे, जबकि यह स्थिति आधिकारिक रूप से 28 मई को सामने आई। उन्होंने कहा, 'उन बचाव के उपायों की वजह से अब हम कह सकते हैं कि स्थिति लगभग पूरी तरह से नियंत्रण में आ गई है।'

आस-पास के इलाकों में शेरों और उनके झुंडों को भी एहतियात के तौर पर निगरानी में रखा जा रहा है। प्रभावित जानवरों से एकत्र किए गए नमूने सटीक कारण की पुष्टि के लिए गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर भेजे गए हैं।

संभावित बीमारी और विशेषज्ञ सहयोग

शुरुआती जाँच में बेबेसियोसिस की ओर संकेत मिला है — यह एक परजीवी रोग है जो लाल रक्त कणिकाओं पर हमला करता है और जानवरों में कमज़ोरी, साँस लेने में कठिनाई तथा गंभीर बीमारी पैदा कर सकता है। हालाँकि आधिकारिक प्रयोगशाला पुष्टि अभी बाकी है।

जूनागढ़ वेटेरिनरी कॉलेज के विशेषज्ञ और इंडियन वेटेरिनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IVRI) के विशेषज्ञ जाँच और उपचार प्रयासों में सहयोग कर रहे हैं। मोढवाडिया ने कहा, 'हमारे वन विभाग के अधिकारियों और स्टाफ के पास ऐसी विशेषज्ञता है जो न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया को मार्गदर्शन दे सकती है।'

2018 के प्रकोप से तुलना और चिंताएँ

वन्यजीव प्राधिकरण स्थिति पर बारीकी से नज़र रख रहा है, क्योंकि 2018 में गिर में एक बड़ा प्रकोप हुआ था जब कैनाइन डिस्टेंपर वायरस और बेबेसिया संक्रमण के संयोजन से शेरों की मौतें काफी बढ़ गई थीं। रिपोर्टों के अनुसार इसी संयोजन के दोबारा उभरने की संभावना को लेकर चिंता जताई जा रही है, हालाँकि अभी प्रयोगशाला पुष्टि का इंतजार है।

गौरतलब है कि 2025 में हुई राज्य की हालिया जनगणना के अनुसार गिर में एशियाई शेरों की आबादी 891 तक पहुँच गई है। यह प्रजाति विश्व में केवल गुजरात के जंगलों में ही जीवित है और गिर से आगे सौराष्ट्र क्षेत्र के कई जिलों में फैल चुकी है।

सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की राह

मंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में राज्य सरकार एशियाई शेरों के संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने जानवरों की सुरक्षा के लिए चौबीसों घंटे काम करने वाले वन कर्मचारियों के प्रयासों की सराहना की। प्रयोगशाला रिपोर्ट आने के बाद उपचार प्रोटोकॉल को और परिष्कृत किया जाएगा, जिससे इस दुर्लभ प्रजाति के दीर्घकालिक संरक्षण की दिशा तय होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें कैनाइन डिस्टेंपर और बेबेसिया के संयोजन ने दर्जनों शेरों की जान ली थी, यह साबित कर चुका है कि एकल-स्थान पर निर्भर प्रजाति के लिए बीमारी का फैलाव कितना विनाशकारी हो सकता है। सवाल यह है कि क्या वन विभाग ने उस प्रकोप के बाद स्थायी प्रारंभिक-चेतावनी तंत्र और अंतर-जिला निगरानी ग्रिड स्थापित किया — या हर बार संकट आने पर प्रतिक्रियात्मक अभियान चलाना ही नीति बनी रहेगी। 891 की आबादी उत्साहजनक है, लेकिन यह प्रजाति अभी भी 'क्रिटिकली एंडेंजर्ड' की दहलीज़ पर है, और किसी भी बड़े प्रकोप का असर अपूरणीय हो सकता है।
RashtraPress
19 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गिर के शेरों को कौन-सी बीमारी हुई है?
शुरुआती जाँच में बेबेसियोसिस का संकेत मिला है, जो एक परजीवी रोग है जो लाल रक्त कणिकाओं पर हमला करता है और कमज़ोरी, साँस की तकलीफ तथा गंभीर बीमारी पैदा कर सकता है। हालाँकि आधिकारिक पुष्टि के लिए नमूने गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर भेजे गए हैं और लैब रिपोर्ट का इंतजार है।
गिर में अब तक कितने शेरों की मौत हुई है?
संदिग्ध संक्रमण से अब तक 8 शेरों की मौत दर्ज की गई है। वन मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने 31 मई को बताया कि पिछले तीन दिनों में कोई नई मौत नहीं हुई है और स्थिति नियंत्रण में है।
क्या 2018 जैसा प्रकोप दोबारा हो सकता है?
वन्यजीव अधिकारी इस संभावना को लेकर सतर्क हैं क्योंकि 2018 में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस और बेबेसिया संक्रमण के संयोजन से गिर में बड़ी संख्या में शेरों की मौत हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार इसी संयोजन के दोबारा उभरने की आशंका जताई जा रही है, हालाँकि लैब पुष्टि बाकी है।
गुजरात में कुल कितने एशियाई शेर हैं?
2025 में हुई राज्य की हालिया जनगणना के अनुसार गुजरात में एशियाई शेरों की आबादी 891 तक पहुँच गई है। यह प्रजाति विश्व में केवल गुजरात के जंगलों में जीवित है और गिर से आगे सौराष्ट्र क्षेत्र के कई जिलों में फैल चुकी है।
वन विभाग ने संक्रमण रोकने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
वन विभाग ने लगभग 500 शेरों को कृमिनाशक दवा दी है, प्रभावित क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे में शेरों को अलग किया है और बड़े पैमाने पर एंटी-टिक अभियान चलाया है। जूनागढ़ वेटेरिनरी कॉलेज और IVRI के विशेषज्ञ उपचार में सहयोग कर रहे हैं, और 17 शेर निगरानी में हैं।
राष्ट्र प्रेस
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