'शोले' के निर्माता जी.पी. सिप्पी का असली सरनेम था 'सिपाहिमलानी', जानें कैसे बना 'सिप्पी'
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के इतिहास में जी.पी. सिप्पी का नाम उन गिने-चुने निर्माताओं में शुमार है, जिन्होंने एक ऐसी फिल्म बनाई जो दशकों बाद भी अपनी चमक नहीं खोती। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस 'सिप्पी' नाम से वह पूरी इंडस्ट्री में पहचाने गए, वह उनके परिवार का मूल सरनेम नहीं था। उनका वास्तविक नाम गोपालदास परमानंद सिपाहिमलानी था, और 'सिप्पी' नाम एक सहज सामाजिक संक्षेपण से उभरा जो आगे चलकर उनकी स्थायी पहचान बन गया।
सिंध से मुंबई तक: बंटवारे का दर्द और नई शुरुआत
जी.पी. सिप्पी का जन्म 14 सितंबर 1914 को हैदराबाद, सिंध में हुआ था — जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था और अब पाकिस्तान में है। वह एक संपन्न कारोबारी परिवार से थे, जिनके कारोबारी संबंध अंग्रेजों और अन्य यूरोपीय व्यापारियों तक फैले हुए थे।
'सिपाहिमलानी' नाम का उच्चारण जटिल होने के कारण लोग इसे संक्षिप्त करके 'सिप्पी' पुकारने लगे, और धीरे-धीरे यही नाम परिवार की पहचान बन गया। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन ने इस परिवार की ज़िंदगी को उलट-पुलट कर दिया। सिप्पी परिवार को सिंध छोड़कर भारत आना पड़ा और वे मुंबई में जा बसे।
वकील से निर्माता तक का सफर
फिल्मों में आने से पहले जी.पी. सिप्पी ने कानून की पढ़ाई की और वकील के रूप में काम किया। मुंबई पहुँचने के बाद उन्होंने प्रॉपर्टी और कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में कदम रखा। कोलाबा और चर्चगेट जैसे इलाकों में इमारतों के निर्माण और बिक्री से उन्होंने अपनी नई पारी की शुरुआत की।
फिल्मों से उनका नाता तब जुड़ा जब मरीन लाइंस इलाके में 'गोविंद महल' परियोजना के निर्माण अधिकार बेचने से प्राप्त पूँजी का उपयोग उन्होंने पहली फिल्म के निर्माण में किया। इस तरह एक वकील और कारोबारी का फिल्मी सफर शुरू हुआ। 1951 में उन्होंने 'सजा' से बतौर प्रोड्यूसर हिंदी सिनेमा में प्रवेश किया, जिसमें देव आनंद और निम्मी मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म को बड़ी व्यावसायिक सफलता नहीं मिली, लेकिन इसने उनके फिल्मी करियर की नींव रख दी।
निर्देशक और निर्माता दोनों रूपों में सक्रिय
1950 के दशक में जी.पी. सिप्पी ने 'शाहेंशाह', 'भाई-बहन', '12 ओ'क्लॉक' और 'मरीन ड्राइव' जैसी फिल्मों में काम किया। वह महज निर्माता नहीं थे — 'मरीन ड्राइव', 'अदल-ए-जहांगीर', 'श्रीमती 420', 'लाइट हाउस' और 'मिस्टर इंडिया' जैसी फिल्मों का निर्देशन भी उन्होंने किया। 1960 के दशक के बाद उनका ध्यान मुख्यतः निर्माण की ओर केंद्रित हो गया।
इसके बाद 'ब्रह्मचारी', 'अंदाज' और 1972 में आई 'सीता और गीता' जैसी फिल्मों ने उनकी साख को और मजबूत किया। गौरतलब है कि 'सीता और गीता' उस दौर की सबसे सफल हिंदी फिल्मों में रही।
'शोले' — वह फिल्म जो इतिहास बन गई
1975 में उनके बेटे रमेश सिप्पी के निर्देशन में 'शोले' रिलीज हुई। पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने मिलकर इस फिल्म का निर्माण किया, जो आज भी हिंदी सिनेमा की सर्वकालिक महान फिल्मों में गिनी जाती है। इस एक फिल्म ने जी.पी. सिप्पी के नाम को भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया।
'शोले' के बाद भी उनका फिल्मी सफर जारी रहा। उन्होंने 'शान', 'सागर', 'राजू बन गया जेंटलमैन', 'पत्थर के फूल', 'जमाना दीवाना' और 'हमेशा' जैसी फिल्मों का निर्माण किया।
उद्योग में भूमिका और सम्मान
फिल्म निर्माण के अलावा जी.पी. सिप्पी फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और फिल्म एंड टीवी प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के चेयरमैन के रूप में भी सक्रिय रहे। उन्हें उनके फिल्मी योगदान के लिए 1968 और 1982 में फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।
25 दिसंबर 2007 को 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। सिंध से शुरू हुई उनकी जीवन-यात्रा, बंटवारे का दंश, मुंबई में पुनर्निर्माण और 'शोले' जैसी अमर फिल्म का निर्माण — यह सब मिलकर जी.पी. सिप्पी की विरासत को हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम अध्यायों में दर्ज करते हैं।