ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पेड़ों की कटाई पर लगाई रोक

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ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पेड़ों की कटाई पर लगाई रोक

सारांश

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है। 2016 से अटकी और ₹137 करोड़ से बढ़कर ₹200 करोड़ हो चुकी इस परियोजना पर अब अदालत का अंतिम फैसला निर्णायक होगा।

मुख्य बातें

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 15 मई 2026 को ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर के लिए पेड़ों की कटाई पर अंतरिम रोक लगाई।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की पीठ ने फैसला सुरक्षित रखते हुए यह आदेश दिया।
परियोजना की लागत 2019 में ₹137 करोड़ से बढ़कर ₹200 करोड़ हो गई है — सात वर्षों में 45% की वृद्धि।
याचिकाकर्ता जगवंत बाथ सहित अन्य ने चंडीगढ़ मास्टर प्लान 2031 का हवाला देते हुए कहा कि यह फ्लाईओवर वैधानिक रूप से अनुमत नहीं है।
प्रस्तावित फ्लाईओवर 1.6 किलोमीटर लंबा है और MoRTH से मंजूरी मिली हुई है।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 15 मई 2026 को ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर परियोजना के लिए प्रस्तावित पेड़ों की कटाई पर अंतरिम रोक लगा दी, जिससे चंडीगढ़ में यह बहुप्रतीक्षित बुनियादी ढाँचा परियोजना एक बार फिर अधर में लटक गई है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश याचिका के अंतिम निर्णय तक प्रभावी रहेगा।

न्यायालय का आदेश

मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने आदेश दिया कि चंडीगढ़ प्रशासन और अन्य प्रतिवादी ट्रिब्यून चौक के आसपास किसी भी आम के पेड़ या अन्य वृक्ष को न काटें। पीठ ने यह भी बताया कि इस मामले में सुनवाई पहले ही पूरी हो चुकी है और फैसला शीघ्र आने की संभावना है। अदालत ने बुधवार को ही अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

जगवंत बाथ सहित याचिकाकर्ताओं ने पर्यावरणीय और विरासत संरक्षण की चिंताओं को आधार बनाते हुए वृक्षों की कटाई को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि चंडीगढ़ मास्टर प्लान 2031 — जो पंजाब की राजधानी अधिनियम, 1952 और पंजाब की राजधानी (परिधि) नियंत्रण अधिनियम, 1952 के तहत अधिसूचित एक वैधानिक दस्तावेज़ है — शहर के भीतर फ्लाईओवर निर्माण की सिफारिश नहीं करता। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह दस्तावेज़ अनिवार्य करता है कि पहले वैकल्पिक यातायात प्रबंधन उपायों की तलाश की जाए।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया है कि शहरी नियोजन विभाग शुरुआत में इस परियोजना के विरुद्ध था और उसका मत था कि मास्टर प्लान इसकी अनुमति नहीं देता।

परियोजना का इतिहास और बढ़ती लागत

यह फ्लाईओवर परियोजना 2016 में परिकल्पित की गई थी और इसका उद्देश्य ट्रिब्यून गोलचक्कर पर यातायात के दबाव को कम करना है, क्योंकि शहर में प्रवेश करने वाला अधिकांश यातायात इसी मार्ग से होकर गुजरता है। प्रस्तावित 1.6 किलोमीटर लंबा फ्लाईओवर सेक्टर 32 के सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के बाद शुरू होकर दक्षिण मार्ग पर रेलवे ओवरब्रिज से पहले समाप्त होगा।

बार-बार हुई प्रक्रियात्मक देरी के कारण इस परियोजना की लागत 2019 में ₹137 करोड़ से बढ़कर अब ₹200 करोड़ हो गई है — यानी सात वर्षों में 45 प्रतिशत की वृद्धि। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) से निर्माण की मंजूरी मिलने के बावजूद परियोजना लगातार अटकती रही है।

आगे क्या होगा

न्यायालय का अंतरिम आदेश याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन है। चूँकि पीठ ने फैसला पहले ही सुरक्षित रख लिया है, इसलिए अब सभी की निगाहें अंतिम निर्णय पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल इस परियोजना की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य में चंडीगढ़ के नियोजित शहरी ढाँचे में बुनियादी ढाँचा विकास की सीमाओं को भी परिभाषित करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि चंडीगढ़ की उस नियोजित पहचान का है जिसे ले कोर्बुज़िए ने संजोया था। परियोजना की लागत सात वर्षों में 45 प्रतिशत बढ़ चुकी है, फिर भी बुनियादी कानूनी और पर्यावरणीय प्रश्न अनुत्तरित हैं — यह प्रशासनिक नियोजन की गंभीर चूक है। जब शहरी नियोजन विभाग खुद शुरुआत में इस परियोजना के विरुद्ध था, तो MoRTH की मंजूरी किस आधार पर आगे बढ़ी, यह पारदर्शिता की माँग करता है। अदालत का अंतिम फैसला देश के अन्य विरासत शहरों में बुनियादी ढाँचे और पर्यावरण के बीच संतुलन की मिसाल बन सकता है।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर पर क्या आदेश दिया?
अदालत ने 15 मई 2026 को चंडीगढ़ प्रशासन को ट्रिब्यून चौक के आसपास किसी भी पेड़ को काटने से रोकने का अंतरिम आदेश दिया। यह आदेश याचिका के अंतिम निर्णय तक प्रभावी रहेगा।
ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर परियोजना क्या है?
यह 2016 में परिकल्पित 1.6 किलोमीटर लंबा फ्लाईओवर है, जिसका उद्देश्य चंडीगढ़ के ट्रिब्यून गोलचक्कर पर यातायात जाम कम करना है। इसकी लागत ₹137 करोड़ से बढ़कर ₹200 करोड़ हो चुकी है और MoRTH से इसे मंजूरी मिली हुई है।
याचिकाकर्ताओं ने फ्लाईओवर को क्यों चुनौती दी है?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चंडीगढ़ मास्टर प्लान 2031 एक वैधानिक दस्तावेज़ है जो शहर के भीतर फ्लाईओवर निर्माण की सिफारिश नहीं करता और वैकल्पिक यातायात उपाय खोजना अनिवार्य बनाता है। उन्होंने पर्यावरणीय नुकसान और शहर की विरासत को खतरे का भी हवाला दिया है।
इस परियोजना की लागत इतनी क्यों बढ़ी?
बार-बार हुई प्रक्रियात्मक और कानूनी देरी के कारण परियोजना की लागत 2019 के ₹137 करोड़ से बढ़कर ₹200 करोड़ हो गई है, जो सात वर्षों में 45 प्रतिशत की वृद्धि है।
राष्ट्र प्रेस
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