हिमाचल हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: ट्राउट मछलियों के संरक्षण के लिए 12 लाख रुपये का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
चंडीगढ़, 16 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पर्यावरणीय अधिकारों को आर्थिक लाभों से अधिक महत्व देते हुए पंजाब द्वारा संचालित शानन हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं। अदालत ने बारोट स्थल पर हर वर्ष 1 मार्च से पहले डी-सिल्टिंग (गाद हटाने) पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे ट्राउट मछलियों के प्रजनन काल की रक्षा की जा सके।
मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि तलछट (सिल्ट) के प्रवाह की वैज्ञानिक निगरानी की जाए और ट्राउट मछलियों के पुनर्वास के लिए 12 लाख रुपये जमा किए जाएं।
अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई की, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मंडी जिले के बारोट बांध से छोड़ी जा रही गाद के कारण पानी की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है और जलीय जीवन को नुकसान हो रहा है।
पीठ ने कहा कि “रेनबो ट्राउट और ब्राउन ट्राउट मछलियां गाद के तूफान में फंसकर सांस लेने में असमर्थ हैं और प्रजनन नहीं कर पा रही हैं।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित परियोजना हर साल 1 मार्च से पहले डी-सिल्टिंग नहीं करेगी। यह अवधि नवंबर से फरवरी तक ट्राउट के प्रजनन के लिए निर्धारित बंद सीजन के अनुरूप है।
भविष्य में निगरानी के लिए अदालत ने निर्देश दिया कि स्कॉर आउटलेट और डाउनस्ट्रीम के विभिन्न स्थानों पर सेंसर स्थापित किए जाएं, ताकि टोटल सस्पेंडेड सॉलिड्स स्तर की रियल-टाइम निगरानी हो सके।
मत्स्य विभाग को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि कम जल प्रवाह के दौरान राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा निर्धारित न्यूनतम डिस्चार्ज का कम से कम 15 प्रतिशत पानी छोड़ा जाए और परियोजना द्वारा जल भंडारण न किया जाए।
साथ ही, राज्य सरकार को डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता में एक रिवर मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें मत्स्य और बिजली विभाग के अधिकारी और परियोजना प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति डी-सिल्टिंग के समय और तरीके पर सुझाव देगी।
पर्यावरणीय नुकसान को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने परियोजना संचालक को 12 लाख रुपये मत्स्य विभाग में जमा करने का आदेश दिया है, जिसका उपयोग ब्राउन ट्राउट और रेनबो ट्राउट मछलियों के पुनर्स्थापन तथा जलीय जीवन के संरक्षण में किया जाएगा।
अदालत ने पाया कि 2024-25 के दौरान नवंबर से फरवरी के प्रजनन काल में भी डी-सिल्टिंग की गई, जिससे पानी में अत्यधिक गंदलापन (टर्बिडिटी) बढ़ा और जलीय पारिस्थितिकी को नुकसान हुआ।
विशेषज्ञों की राय का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि पानी में गाद का प्रभाव “लगातार चलने वाले रेत के तूफान” जैसा होता है, जिससे मछलियों को सांस लेने में कठिनाई होती है।