मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कारपूलिंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और वर्चुअल सुनवाई को मिली प्राथमिकता
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 24 जून 2026 को राज्य की समूची न्यायिक व्यवस्था में ईंधन संरक्षण को अनिवार्य प्राथमिकता बनाते हुए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के तहत न्यायिक अधिकारियों, कोर्ट स्टाफ और वकीलों को कारपूलिंग, सार्वजनिक परिवहन और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को अपनाने के लिए कहा गया है, जबकि यह सुनिश्चित किया गया है कि न्यायिक कामकाज बाधित न हो।
निर्देश कहाँ और कैसे जारी हुए
ये दिशा-निर्देश रजिस्ट्रार जनरल द्वारा कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर बुधवार को जारी किए गए। ये नियम जबलपुर स्थित मुख्य पीठ के साथ-साथ इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों तथा राज्य के समस्त जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों पर समान रूप से लागू होंगे। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में ईंधन संरक्षण को लेकर संस्थागत जागरूकता बढ़ रही है।
सरकारी वाहनों पर नई बंदिशें
आदेश के अनुसार, अदालतों से संबद्ध सरकारी वाहनों का उपयोग अब केवल न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों तक सीमित रहेगा। अधिकारियों को रूट-आधारित परिवहन योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि वाहनों का इष्टतम उपयोग हो और अनावश्यक ईंधन व्यय घटाया जा सके।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि आपात स्थिति, सुरक्षा आवश्यकता, प्रोटोकॉल ड्यूटी या चिकित्सा ज़रूरत जैसे विशेष मामलों को छोड़कर किसी भी अधिकारी को अलग वाहन सुविधा नहीं मिलेगी।
वकीलों और कर्मचारियों के लिए सुझाव
वकीलों और न्यायालय कर्मचारियों को सलाह दी गई है कि वे जहाँ संभव हो, सार्वजनिक परिवहन, कारपूलिंग और दोपहिया वाहन साझाकरण को अपनाएँ। अधिक यात्री-घनत्व वाले मार्गों पर मिनी बस और ट्रैवलर वैन जैसी साझा परिवहन सुविधाओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया है।
तकनीक का अधिकतम उपयोग
कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जहाँ व्यावहारिक हो, वकील वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बहस करें और प्रशासनिक बैठकें वर्चुअल माध्यम से संचालित की जाएँ। गौरतलब है कि कोविड-19 के बाद न्यायपालिका में वर्चुअल सुनवाई की परंपरा पहले से स्थापित हो चुकी है, और यह आदेश उसी दिशा में एक और कदम है।
निगरानी और समीक्षा की व्यवस्था
निगरानी को प्रभावी बनाने के लिए रजिस्ट्री को सरकारी वाहनों के ईंधन उपयोग की दैनिक निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं। वाहन-आवंटन कार्य की प्राथमिकता और ज़रूरत के आधार पर तय होगा और समय-समय पर इसकी समीक्षा भी की जाएगी। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था अस्थायी है और इसका एकमात्र उद्देश्य ईंधन संरक्षण को बढ़ावा देना है — न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्यों की निरंतरता इससे प्रभावित नहीं होगी।