हैदराबाद स्कूल 'कलमा' होमवर्क विवाद: छात्र की चाची बोलीं — 'बच्चों पर कोई भी धर्म नहीं थोपा जाना चाहिए'
सारांश
मुख्य बातें
हैदराबाद के एक निजी स्कूल में कथित तौर पर एक हिंदू छात्र की डायरी में 'कलमा' और 'सूरा फातिहा' पढ़ने के निर्देश लिखे जाने का मामला 16 जुलाई 2026 को सामने आया, जिसके बाद अभिभावकों, स्थानीय निवासियों और कई हिंदू संगठनों ने स्कूल प्रशासन के विरुद्ध तीखी नाराज़गी जताई। इस पूरे विवाद पर छात्र की चाची ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिक्षा संस्थानों को किसी भी धर्म की प्रथाएँ बच्चों पर अनिवार्य रूप से नहीं थोपनी चाहिए।
क्या है पूरा मामला
छात्र की चाची ने बताया कि स्कूल की डायरी और नोट्स में बच्चे के लिए 'कलमा पढ़िए' और 'सूरा फातिहा पढ़िए' जैसे निर्देश लिखे गए थे। उन्होंने बताया कि पहले दिन यह टिप्पणी लिखी गई, फिर काट दी गई, लेकिन अगले दिन पुनः वही निर्देश दोहराए गए — जिससे उन्हें यह महज लिपिकीय भूल नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया व्यवहार प्रतीत हुआ।
जब परिजन ने स्कूल प्रशासन से स्पष्टीकरण माँगा, तो पहले बताया गया कि यह एक धार्मिक अभ्यास है और सभी बच्चों के लिए अनिवार्य है। बाद में स्कूल ने पलटते हुए कहा कि डायरी में यह निर्देश गलती से लिखा गया था।
परिजन की आपत्ति और सवाल
चाची ने स्कूल के इस स्पष्टीकरण पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब बच्चे का नाम डायरी में स्पष्ट रूप से दर्ज था, तो इसे केवल गलती कैसे माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि एक अभिभावक के रूप में यह बात उन्हें व्यक्तिगत रूप से आहत करने वाली लगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि स्कूल सभी धर्मों के बारे में समान रूप से जानकारी देना चाहता है, तो भगवद्गीता, बाइबिल और कुरान सहित सभी धार्मिक ग्रंथों का परिचय कराया जा सकता है — लेकिन किसी एक धर्म की प्रार्थना या पाठ को अनिवार्य बनाना उचित नहीं है।
स्कूल की कार्रवाई
मामले के सार्वजनिक होने के बाद स्कूल प्रबंधन ने संबंधित शिक्षक को सेवा से हटा दिया। छात्र की चाची ने इस त्वरित कार्रवाई के लिए स्कूल प्रशासन का आभार व्यक्त किया और कहा कि इस निर्णय से उन्हें संतोष मिला है।
शिक्षा संस्थानों से अपील
चाची ने देशभर के शिक्षा संस्थानों से अपील करते हुए कहा कि स्कूलों का मूल उद्देश्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना, उनके मानसिक और शारीरिक विकास पर ध्यान देना तथा खेलकूद और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को बढ़ावा देना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब बच्चे परिपक्व होते हैं, तब वे स्वयं अपने धार्मिक विश्वासों को समझने और अपनाने का निर्णय ले सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि समाज में सभी समुदायों के बीच आपसी सम्मान और सौहार्द बनाए रखना ज़रूरी है और शिक्षा संस्थानों को इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। यह विवाद उस व्यापक बहस को फिर से केंद्र में ले आया है कि भारत के धर्मनिरपेक्ष शैक्षणिक परिवेश में धार्मिक सामग्री की क्या और कितनी भूमिका होनी चाहिए।