आईआईटी बॉम्बे छात्र की मौत पर प्रियंका चतुर्वेदी बोलीं — प्रोफेसरों को निकालना ऊपरी इलाज, असली सर्जरी बाकी
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने सोमवार, 21 सितंबर 2026 को आईआईटी बॉम्बे के एक छात्र की मौत पर तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि विरोध-प्रदर्शन को शांत करने के लिए प्रोफेसरों को बर्खास्त करना उस समस्या का महज ऊपरी इलाज है, जिसके लिए असल में 'सर्जरी' की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि परीक्षा में नकल की रिपोर्ट करने वाले प्रोफेसरों पर दोष मढ़ना और मामले को जातिगत भेदभाव से जोड़ना गलत दिशा में ले जाता है।
मुख्य घटनाक्रम
आईआईटी बॉम्बे के एक छात्र की मौत के बाद कैंपस में विरोध-प्रदर्शन भड़क उठा था, जिसमें छात्रों ने संस्थान के प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। इसके बाद संस्थान ने कार्रवाई करते हुए कुछ प्रोफेसरों को हटाने का फैसला लिया। इस फैसले पर अब राजनीतिक हलकों से तीव्र प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।
सांसद चतुर्वेदी का बयान
सांसद चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'आईआईटी बॉम्बे के छात्र की मौत बेहद दुखद है और यह एक और याद दिलाती है कि इन बड़े संस्थानों को कैंपस के माहौल और मानसिक स्वास्थ्य पर काम करने की जरूरत है। हालांकि विरोध-प्रदर्शन को खत्म करने के लिए प्रोफेसरों को नौकरी से निकालना एक ऐसी समस्या का सिर्फ ऊपरी इलाज है, जिसके लिए असल में सर्जरी की जरूरत है।'
उन्होंने आगे कहा, 'साथ ही, उन प्रोफेसरों पर दोष मढ़ना जो परीक्षा के दौरान नकल की रिपोर्ट करने का अपना काम कर रहे थे और इसे जातिगत भेदभाव का मुद्दा बना देना, एक दुखद नतीजा है।'
कैंपस माहौल और मानसिक स्वास्थ्य पर जोर
चतुर्वेदी ने अपने बयान में ज़ोर देकर कहा कि इस तरह की घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कितना और कितने गहरे स्तर पर काम हो रहा है। उनका कहना था कि केवल प्रोफेसरों को बर्खास्त करने से समस्या का समाधान नहीं होगा — बल्कि उसके मूल कारणों को समझना और दूर करना ज़रूरी है।
गौरतलब है कि आईआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों में छात्रों पर शैक्षणिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य संकट का मुद्दा पहले भी कई बार उठ चुका है। यह ऐसे समय में आया है जब देश के कई प्रमुख उच्च-शिक्षा संस्थानों में कैंपस कल्याण व्यवस्था की पर्याप्तता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।
जातिगत भेदभाव के आरोपों पर सवाल
चतुर्वेदी ने स्पष्ट किया कि जो प्रोफेसर परीक्षा में नकल की रिपोर्ट करने जैसा अपना नियमित कर्तव्य निभा रहे थे, उन पर दोषारोपण करना और इस प्रकरण को जातिगत भेदभाव से जोड़ना मामले को गलत दिशा में मोड़ना है। उनके अनुसार, यह दृष्टिकोण असली समस्या को ओझल कर देता है।
आगे क्या
मामले में अभी जाँच जारी है। राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ सामने आने के साथ यह विवाद आने वाले दिनों में और गहरा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना को देखते हुए संस्थानों में व्यापक मानसिक स्वास्थ्य नीति की माँग और तेज़ होगी।