यूएनएससी सुधार: भारत ने 'डी फैक्टो वीटो' की निंदा की, स्थायी सदस्यता में वीटो अधिकार की माँग दोहराई
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 27 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में यूएनएससी सुधार पर हुई बहस के दौरान 'डी फैक्टो वीटो' की कड़ी आलोचना की और स्पष्ट किया कि वीटो अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का प्रतीक है। उन्होंने चेतावनी दी कि इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स (आईजीएन) प्रक्रिया में 'आम सहमति' की दलील को एक अप्रत्यक्ष वीटो के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे सुधार की राह अवरुद्ध हो रही है।
मुख्य घटनाक्रम
पी5 देशों के वीटो अधिकारों पर सोमवार को हुई इस बहस में हरीश ने कहा कि 2008 का महासभा प्रस्ताव—जो आईजीएन के लिए आधारभूत दस्तावेज़ है—पूरी तरह स्पष्ट है: इसका मुख्य सिद्धांत 'अधिकतम राजनीतिक स्वीकृति' है, न कि 'आम सहमति'। उन्होंने रेखांकित किया कि बातचीत के 17 दौर पूरे होने के बाद भी कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।
हरीश ने कहा, 'आईजीएन प्रक्रिया में भी 'आम सहमति' की दलील का इस्तेमाल एक डी फैक्टो वीटो (छिपे हुए) के रूप में किया जा रहा है।' उन्होंने इसे उस प्रस्ताव की मूल भावना के विरुद्ध बताया जिसने आईजीएन को जन्म दिया था।
'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' की भूमिका
'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' नामक देशों के एक छोटे समूह ने प्रक्रिया संबंधी पैंतरों का इस्तेमाल करके आईजीएन को किसी भी मसौदे पर बातचीत शुरू करने से रोक रखा है। इस समूह का नेतृत्व इटली कर रहा है और इसमें पाकिस्तान भी शामिल है।
हरीश ने इस संदर्भ में 'व्यापक डी फैक्टो वीटो' की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा, 'वीटो सिर्फ वह नहीं है जिसका इस्तेमाल खुले तौर पर किया जाता है। एक डी फैक्टो वीटो भी होता है, जो सुरक्षा परिषद के हर सदस्य—चाहे वह चुना गया हो या नहीं—के पास होता है। इसका इस्तेमाल वे अध्यक्षीय बयानों, प्रेस बयानों और प्रतिबंध समितियों के फैसलों पर कर सकते हैं।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 'आम सहमति के अलिखित नियम' के तहत कोई भी एक सदस्य किसी प्रस्ताव को बिना कारण बताए रोक सकता है।
चीन और पाकिस्तान से जुड़े आतंकवाद के मामलों का संदर्भ
इस बहस में चीन के उस रवैये का उदाहरण भी सामने आया जिसमें उसने प्रतिबंध समिति की गुप्त बैठकों में पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों—जैसे लश्कर-ए-तैयबा के जकी-उर-रहमान लखवी और शाहिद महमूद, तथा जैश-ए-मोहम्मद के साजिद मीर और मसूद अजहर—पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को अवरुद्ध किया। यह डी फैक्टो वीटो के दुरुपयोग का एक व्यावहारिक उदाहरण है जिसे भारत लगातार उठाता रहा है।
भारत का सिद्धांत-आधारित रुख
हरीश ने दो-टूक कहा कि नए स्थायी सदस्यों को 'दूसरे दर्जे' में रखने का कोई भी प्रस्ताव—चाहे वह लंबे कार्यकाल वाली सदस्यता हो या बिना वीटो अधिकार वाली स्थायी सदस्यता—अस्वीकार्य है। उनके अनुसार, 'इससे उस असमानता को और गहरा किया जाएगा जिसे हम दूर करना चाहते हैं।'
भारत ने यह भी पुनः स्पष्ट किया कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, एक सुधारी गई परिषद के सभी नए स्थायी सदस्यों के पास भी यह अधिकार होना चाहिए। हरीश ने कहा, 'निष्पक्षता और न्याय की यही मांग है।'
क्या होगा आगे
हरीश ने व्यापक सुधारों की शुरुआत के लिए 'स्पष्ट समय-सीमा और लक्ष्यों के साथ, मसौदे पर आधारित बातचीत को जल्द शुरू करने' की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि 'सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता से जुड़े सवालों का जवाब सिर्फ वीटो को मैनेज करने से नहीं मिलेगा—इसमें परिषद का विस्तार और नए स्थायी सदस्यों को शामिल करना अनिवार्य है।' उन्होंने यह भी कहा कि परिषद की संरचना 'आज की वास्तविकताओं को दर्शाए, न कि आठ दशक पहले हुए युद्ध के नतीजों को।' यह ऐसे समय में आया है जब भारत जी-4 देशों के साथ मिलकर स्थायी सदस्यता की अपनी दावेदारी को और मज़बूत कर रहा है।