UNSC सुधार पर भारत का तीखा प्रहार: 80 साल पुरानी जंग आज के संयुक्त राष्ट्र को परिभाषित नहीं कर सकती
सारांश
मुख्य बातें
भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 23 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में स्पष्ट शब्दों में कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध का परिणाम — जो 80 वर्ष से भी पहले तय हुआ था — आज की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना और दिशा को निर्धारित नहीं कर सकता। उन्होंने चेताया कि सुरक्षा परिषद में सुधार न होने से संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक विश्वसनीयता लगातार घटती जा रही है।
भारत का मूल तर्क
हरीश ने महासभा में कहा, 'कोई भी युद्ध, खासकर ऐसा युद्ध जो 80 साल से भी पहले हुआ हो, आज की दुनिया की स्थिति तय नहीं कर सकता।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि आठ दशक पहले की जीत के आधार पर हासिल की गई शक्ति, आज की गैर-प्रतिनिधित्व वाली सुरक्षा परिषद की वैधता की कमी को पूरा नहीं कर सकती।
उनके शब्दों में, 'विजेताओं द्वारा, विजेताओं के लिए और विजेताओं की सोच से बनाई गई संस्था ने स्वाभाविक रूप से पीड़ितों की चिंताओं को शामिल नहीं किया।' यह टिप्पणी सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्यों (P5) की वीटो शक्ति पर सीधा प्रहार मानी जा रही है।
द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की भूमिका
हरीश ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए याद दिलाया कि करीब 25 लाख भारतीयों ने उस युद्ध में हिस्सा लिया था और लगभग 90 हजार भारतीय सैनिकों ने अपना बलिदान दिया था। उन्होंने बंगाल अकाल का भी उल्लेख किया, जिसमें युद्धकालीन औपनिवेशिक नीतियों के कारण 40 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई थी।
गौरतलब है कि भारत की इतनी बड़ी भागीदारी और कुर्बानी के बावजूद उसे 1945 में बनी सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता नहीं मिली, जबकि तत्कालीन विजेता शक्तियाँ आज भी वीटो-धारक बनी हुई हैं। हरीश के अनुसार, कुछ पक्ष इस ऐतिहासिक सच्चाई को नजरअंदाज करना चाहते हैं।
सुधार प्रक्रिया में अवरोध
हरीश ने आरोप लगाया कि इटली के नेतृत्व में एक छोटे देशों के समूह ने — जिसे 'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' (UFC) कहा जाता है और जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है — अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) के लिए जरूरी मसौदा पाठ को अपनाने से रोका हुआ है।
UFC का तर्क है कि मसौदा पाठ अपनाने से पहले सभी देशों के बीच सर्वसम्मति होनी चाहिए। इस पर हरीश ने पलटवार किया: 'हमें यह सोच समझ नहीं आती, क्योंकि किसी भी बहुपक्षीय प्रक्रिया में बातचीत शुरू करने के लिए पहले एक मसौदा पाठ जरूरी होता है, न कि बातचीत खत्म होने के बाद।'
भारत की माँग और आगे की राह
हरीश ने जोर देकर कहा कि सुरक्षा परिषद सुधार से जुड़ी वार्ताएँ लिखित मसौदे के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए — ठीक वैसे ही जैसे संयुक्त राष्ट्र की अन्य प्रक्रियाएँ चलती हैं। उन्होंने बातचीत के लिए स्पष्ट समय-सीमा और निर्धारित दिशा तय करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक मंचों पर बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की माँग तेज हो रही है और भारत, ब्राजील, जापान व जर्मनी — जिन्हें G4 कहा जाता है — लंबे समय से स्थायी सदस्यता की दावेदारी पेश कर रहे हैं। भारत की इस पहल से आगामी IGN सत्रों में नई गतिशीलता उत्पन्न होने की संभावना है।