ट्रंप के दबाव में भारत की डायवर्सिफिकेशन रणनीति: ऊर्जा से सेमीकंडक्टर तक हर क्षेत्र में नए साझेदार
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में एच-1बी वीजा की सख्ती, टैरिफ विवाद और कड़े प्रवासन कानूनों के बावजूद भारत ने टकराव का रास्ता नहीं चुना — बल्कि विविधीकरण (डायवर्सिफिकेशन) की दीर्घकालिक रणनीति को अपनी विदेश और आर्थिक नीति का केंद्र बना लिया। नई दिल्ली ने ऊर्जा, रक्षा, फार्मा, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों सहित हर प्रमुख क्षेत्र में आपूर्ति स्रोतों और साझेदार देशों का दायरा व्यापक किया है। यह ऐसे समय में आया है जब ईरान-अमेरिका तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बाधित हुई और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला पर संकट के बादल मंडराए।
अमेरिकी दबाव के मोर्चे
ट्रंप प्रशासन ने कई मोर्चों पर भारत को चुनौती दी। एच-1बी वीजा के नियम कड़े करने की घोषणा ने भारतीय आईटी पेशेवरों और प्रौद्योगिकी कंपनियों में अनिश्चितता पैदा की। व्यापारिक मोर्चे पर टैरिफ और बाज़ार पहुँच को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद उभरे। इसके अलावा, प्रवासन कानूनों पर ट्रंप प्रशासन के सख्त रुख ने द्विपक्षीय संबंधों में तनाव के नए आयाम जोड़े। गौरतलब है कि इन सभी दबावों के बावजूद भारत ने सार्वजनिक टकराव से परहेज करते हुए रणनीतिक धैर्य का प्रदर्शन किया।
ऊर्जा सुरक्षा: एक से अनेक स्रोतों की ओर
ऊर्जा क्षेत्र में भारत की निर्भरता पहले पश्चिम एशिया पर केंद्रित थी। अब भारत ने रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, ब्राजील और गुयाना से तेल खरीद के विकल्प सक्रिय रखे हैं। रिपोर्टों के अनुसार वेनेजुएला के साथ भी बातचीत जारी है। ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान होर्मुज से आपूर्ति बाधित होने पर भारत ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और वैकल्पिक स्रोतों के ज़रिए घरेलू अर्थव्यवस्था पर असर को न्यूनतम रखने का प्रयास किया।
फार्मा, स्वास्थ्य और सेमीकंडक्टर में विविधता
भारत को 'दुनिया की फार्मेसी' कहा जाता है, लेकिन सक्रिय औषधीय सामग्री (एपीआई) के लिए लंबे समय तक चीन पर निर्भरता बनी रही। इस कमज़ोरी को दूर करने के लिए यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया से आपूर्ति के नए रास्ते खोले गए और घरेलू एपीआई उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना को आगे बढ़ाया गया। स्वास्थ्य उपकरणों के क्षेत्र में अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और इजरायल को नए स्रोत के रूप में विकसित किया गया, साथ ही देश में 'मेक इन इंडिया' के तहत मेडिकल डिवाइस पार्क स्थापित किए गए।
सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत ने ताइवान, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर के साथ साझेदारी की। गुजरात और असम में सेमीकंडक्टर परियोजनाएँ इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।
रक्षा और व्यापार में संतुलित कूटनीति
रक्षा खरीद में भारत ने फ्रांस, अमेरिका, रूस, इजरायल और दक्षिण कोरिया के साथ साझेदारी को एक साथ आगे बढ़ाया — किसी एक शक्ति-केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए। व्यापार और निवेश के मोर्चे पर यूएई (CEPA), ऑस्ट्रेलिया (ECTA), यूरोपीय संघ (FTA), ब्रिटेन (FTA) और आसियान देशों के साथ आर्थिक संबंध प्रगाढ़ करने की कोशिश की गई। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) इसी रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ है।
उर्वरक और खाद्य सुरक्षा के लिए रूस, सऊदी अरब, मोरक्को, ओमान, जॉर्डन और कनाडा के साथ सहयोग मज़बूत किया गया। भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, चिली, कांगो और कनाडा के साथ साझेदारी को आगे बढ़ाया गया।
आगे की राह
विश्लेषकों के अनुसार भारत की यह बहुआयामी रणनीति अल्पकाल में राजनयिक संतुलन की माँग करती है और दीर्घकाल में आपूर्ति शृंखला की मज़बूती सुनिश्चित करती है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान संकट और अमेरिकी नीतिगत सख्ती के तिहरे दबाव के बीच भारत की अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति इस विविधीकरण नीति की प्रारंभिक सफलता का संकेत देती है। आने वाले वर्षों में इन समझौतों और साझेदारियों का क्रियान्वयन ही तय करेगा कि यह रणनीति कितनी कारगर साबित होती है।