टीईपीए लागू होने के बाद भारत-आइसलैंड संबंध नई ऊँचाई पर: राजदूत होस्कुल्डसन
सारांश
मुख्य बातें
भारत-ईएफटीए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते (टीईपीए) के लागू होने के बाद भारत और आइसलैंड के द्विपक्षीय संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। नई दिल्ली में आइसलैंड के राजदूत बेनेडिक्ट होस्कुल्डसन ने 23 सितंबर 2026 को एक विशेष साक्षात्कार में यह बात कही। उन्होंने रेखांकित किया कि टीईपीए ने दोनों देशों के बीच सहयोग का एक दीर्घकालिक और ठोस आधार तैयार किया है।
टीईपीए का प्रभाव और नई पहलें
राजदूत होस्कुल्डसन के अनुसार, पिछले वर्ष अक्टूबर में भारत-ईएफटीए समझौता लागू होने के बाद आइसलैंड ने भारत में अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कई सक्रिय कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा, 'टीईपीए वास्तव में हमारे दोनों देशों के बीच बढ़ते संबंधों को मजबूती से स्थापित करता है।' यह समझौता महज व्यापारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ढाँचा है जो भविष्य के सहयोग की राह तय करता है।
समझौते के क्रियान्वयन के बाद आइसलैंड ने भारत के तीन अलग-अलग शहरों में पर्यटन-केंद्रित कार्यशालाओं का आयोजन किया, जिनके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। इसके साथ ही नई दिल्ली में आइसलैंडिक समुद्री खाद्य उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष व्यावसायिक कार्यक्रम भी आयोजित हुआ। आइसलैंड की ओर से भारत के समुद्री क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण निवेश भी किया गया है, जो इस साझेदारी की गहराई को दर्शाता है।
भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका
होस्कुल्डसन ने कहा कि आइसलैंड भारत को आने वाले वर्षों में तेज़ी से उभरने वाले बाज़ार के रूप में देखता है। उनके अनुसार, पिछले एक दशक में भारत की आर्थिक और तकनीकी प्रगति उल्लेखनीय रही है, जिससे एशिया और विश्व स्तर पर उसका भू-राजनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यापार गठबंधनों का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है और छोटे किंतु तकनीकी रूप से उन्नत देश भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ संबंध प्रगाढ़ कर रहे हैं।
भू-तापीय ऊर्जा में सहयोग
जलवायु परिवर्तन से निपटने के संदर्भ में राजदूत ने दो प्रमुख क्षेत्रों का उल्लेख किया जहाँ दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। पहला क्षेत्र भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) है। होस्कुल्डसन ने बताया कि आइसलैंड को इस क्षेत्र में लगभग 100 वर्षों का अनुभव है। उच्च तापमान वाले भू-तापीय संसाधनों से बिजली उत्पादन के अतिरिक्त, कम तापमान वाले संसाधनों से विशेष रूप से भारत के उत्तरी और हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को सीधा लाभ पहुँचाया जा सकता है। गौरतलब है कि भारत के पास हिमालयी पट्टी में अप्रयुक्त भू-तापीय क्षमता है, जिसे अभी तक व्यापक पैमाने पर दोहन नहीं किया गया।
कार्बन कैप्चर तकनीक और कठिन उद्योगों का भविष्य
दूसरा प्रमुख क्षेत्र कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (सीसीयूएस) है। राजदूत ने बताया कि आइसलैंड पिछले दो दशकों से अधिक समय से इस तकनीक का व्यावसायिक स्तर पर सफल उपयोग कर रहा है और अब इसे भारत में भी लाने की प्रक्रिया सक्रिय रूप से जारी है।
होस्कुल्डसन के अनुसार, यह तकनीक भारत के उन उद्योगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जहाँ उत्सर्जन कम करना सबसे कठिन माना जाता है — जैसे इस्पात, पेट्रोकेमिकल और सीमेंट क्षेत्र। उन्होंने बताया कि वर्तमान तकनीकों के ज़रिये कार्बन डाइऑक्साइड को भूमिगत बेसाल्ट चट्टानों में सुरक्षित रूप से संग्रहित किया जा सकता है। इसके अलावा, CO₂ और हाइड्रोजन को मिलाकर ई-मेथेनॉल तैयार किया जा सकता है, जिसे भविष्य में विमानन ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है — यह हरित ऊर्जा संक्रमण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
आने वाले समय में भारत-आइसलैंड सहयोग की यह यात्रा न केवल व्यापारिक बल्कि तकनीकी और पर्यावरणीय मोर्चे पर भी गहरी होती दिख रही है।