भारत का निर्यात जुलाई में 44.24 अरब डॉलर पर, वैश्विक अस्थिरता के बावजूद 19.6% की बढ़त
सारांश
मुख्य बातें
भारत का व्यापारिक निर्यात जुलाई 2026 में 19.6 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 44.24 अरब डॉलर पर पहुँच गया, जबकि जून में यह आँकड़ा 40.41 अरब डॉलर था। मध्य पूर्व में जारी तनाव और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के बावजूद यह वृद्धि भारत के निर्यात क्षेत्र की मजबूती को दर्शाती है।
निर्यात वृद्धि के प्रमुख कारण
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने पत्रकारों को बताया कि इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, समुद्री सामान और पेट्रोलियम उत्पादों के अधिक निर्यात ने इस बढ़त में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने यह भी बताया कि जुलाई में पश्चिमी एशियाई देशों को भारत का निर्यात 8.62 प्रतिशत बढ़कर 5.7 अरब डॉलर हो गया — जो इस क्षेत्र में तनाव के बीच एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
आयात में भी उछाल, व्यापार घाटा बढ़ा
हालाँकि, जुलाई में आयात भी बढ़कर 76.22 अरब डॉलर हो गया, जो जून में 70.84 अरब डॉलर था। इसकी मुख्य वजह वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही में व्यवधान रहा, जिसके ज़रिये दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार होता है। इसके अतिरिक्त, लाल सागर के निकट जहाज़ों पर हूथी हमलों ने खाड़ी क्षेत्र से तेल की आवाजाही को और बाधित किया।
आयात में इस वृद्धि के परिणामस्वरूप जुलाई में वस्तु व्यापार घाटा बढ़कर 31.98 अरब डॉलर हो गया, जो जून में 30.43 अरब डॉलर था।
सरकार की प्रतिक्रिया
सरकार ने इस सप्ताह संसद को बताया कि व्यापार घाटे में यह वृद्धि मुख्यतः आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और निर्यात प्रतिस्पर्धा के लिए आवश्यक उत्पादक सामानों के अधिक आयात को दर्शाती है — न कि भारत के बाह्य क्षेत्र में किसी ढाँचागत कमज़ोरी को। सरकार के अनुसार, आयात के बड़े हिस्से में कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी, पूँजीगत वस्तुएँ, सोना, कीमती पत्थर, खाद और अन्य मध्यवर्ती इनपुट शामिल हैं — जो ऊर्जा सुरक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए अनिवार्य हैं।
अप्रैल-जुलाई का समग्र प्रदर्शन
मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल से जुलाई के दौरान निर्यात 17.04 प्रतिशत बढ़कर 173.78 अरब डॉलर हो गया, जबकि आयात 19.27 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 292.38 अरब डॉलर पर पहुँच गया। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यापार पर भू-राजनीतिक दबाव लगातार बने हुए हैं।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर में स्थिति यदि और बिगड़ती है, तो आयात लागत पर दबाव बना रहेगा और व्यापार घाटा आने वाले महीनों में और चौड़ा हो सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग क्षेत्र में निर्यात की रफ्तार बनाए रखना भारत के लिए इस अंतर को पाटने की कुंजी होगी।