गालिबाफ सातवीं बार ईरानी संसद के स्पीकर, 271 में से 235 वोट से जीते
सारांश
मुख्य बातें
ईरान के वरिष्ठ नेता और पूर्व रिवोल्यूशनरी गार्ड कमांडर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ को सोमवार, 25 मई को सातवीं बार मजलिस (ईरानी संसद) का स्पीकर चुना गया। 12वीं संसद के तीसरे वार्षिक सत्र के लिए हुए इस चुनाव में गालिबाफ ने 271 में से 235 वोट हासिल कर पूर्ण बहुमत से जीत दर्ज की। यह जीत ईरान की सत्ता संरचना में उनकी मज़बूत पकड़ की पुष्टि करती है।
चुनाव का घटनाक्रम
12वीं संसद के तीसरे वार्षिक सत्र के लिए प्रेसीडिंग बोर्ड का चुनाव सोमवार सुबह खुले सत्र में आयोजित किया गया। स्पीकर पद के लिए गालिबाफ के अलावा मोहम्मद तकी नक्दली और उस्मान सालारी ने भी उम्मीदवारी दाखिल की थी। तीनों उम्मीदवारों के बीच मतदान में गालिबाफ ने स्पष्ट बढ़त के साथ जीत हासिल की। ईरानी संसद के प्रेसीडिंग बोर्ड में कुल 12 पद होते हैं — एक स्पीकर, दो उपाध्यक्ष, छह सचिव और तीन पर्यवेक्षक।
गालिबाफ की राजनीतिक पृष्ठभूमि
1961 में मशहद में जन्मे गालिबाफ ने कम उम्र में ही इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में शामिल होकर अपने करियर की शुरुआत की। 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान उन्होंने अहम भूमिका निभाई और 1982 में खुर्रमशहर को इराकी कब्जे से मुक्त कराने वाले अभियानों में हिस्सा लिया। वह 12 वर्षों तक तेहरान के मेयर रहे और तीन बार राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में भी उतरे, लेकिन हर बार सफलता नहीं मिली।
2017 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव से अपना नाम वापस लेते हुए कट्टरपंथी खेमे के उम्मीदवार इब्राहिम रईसी का समर्थन किया था। वह 2020 से संसद स्पीकर के पद पर हैं और 11वीं संसद के पूरे कार्यकाल तथा 12वीं संसद के पहले दो वर्षों में भी इस पद पर रहे।
क्षेत्रीय तनाव में गालिबाफ की भूमिका
गालिबाफ हाल के महीनों में अमेरिका के साथ जारी वार्ता और संघर्ष विराम बातचीत में भी अहम भूमिका निभाते रहे हैं। ईरान-इजरायल तनाव और अमेरिका के साथ बढ़ते कूटनीतिक टकराव के बीच उनकी स्थिति और प्रभावशाली हुई है। उन्हें वर्तमान सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई का करीबी माना जाता है, जो ईरान की सत्ता संरचना में उनके कद को और रेखांकित करता है।
आगे क्या
गालिबाफ के सातवीं बार स्पीकर बनने के साथ 12वीं संसद का तीसरा वार्षिक सत्र औपचारिक रूप से शुरू हो गया है। यह ऐसे समय में आया है जब ईरान की विदेश नीति और परमाणु वार्ता एक निर्णायक मोड़ पर है। गालिबाफ की निरंतर उपस्थिति संसदीय नेतृत्व में स्थिरता का संकेत देती है, हालाँकि आलोचकों का कहना है कि यह सत्ता के केंद्रीकरण की प्रवृत्ति को भी दर्शाती है।