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ईरान मिसाइलों से रियायतें लेता है, बातचीत से नहीं: गालिबाफ का एक्स पर बड़ा बयान

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ईरान मिसाइलों से रियायतें लेता है, बातचीत से नहीं: गालिबाफ का एक्स पर बड़ा बयान

सारांश

ईरानी संसद स्पीकर गालिबाफ ने साफ कहा — रियायतें बातचीत से नहीं, मिसाइलों से मिलती हैं। यह बयान तब आया जब अमेरिकी वित्त सचिव बेसेंट ट्रंप की दबाव रणनीति को सफल बता रहे थे। दोनों पक्षों के बयान बताते हैं कि परमाणु वार्ता अभी भी अत्यंत नाज़ुक मोड़ पर है।

मुख्य बातें

ईरानी संसद स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने 29 मई को एक्स पर कहा कि ईरान को रियायतें मिसाइलों से मिलती हैं, बातचीत से नहीं।
गालिबाफ ने स्पष्ट किया कि ईरान केवल ठोस कार्रवाई को मानता है — गारंटियों या मौखिक वचनों पर नहीं।
अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने दावा किया कि ट्रंप प्रशासन की दबाव रणनीति ने ईरान को परमाणु वार्ता के लिए मजबूर किया।
अमेरिका की तीन अटल शर्तें: अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम सौंपना, परमाणु हथियार कार्यक्रम छोड़ना, और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करना।
बेसेंट के अनुसार ईरान की तीन-स्तरीय सत्ता संरचना — सरकार, IRGC , और सुप्रीम लीडर खामेनेई — के बीच बातचीत में तालमेल मुश्किल हो रहा है।

ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने शुक्रवार, 29 मई को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तीखा बयान देते हुए कहा कि ईरान को रियायतें बातचीत की मेज़ से नहीं, बल्कि मिसाइल क्षमता से मिलती हैं। वाशिंगटन के साथ जारी परमाणु वार्ता में तेहरान के शीर्ष वार्ताकार की भूमिका निभा रहे गालिबाफ का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका-ईरान परमाणु समझौते की संभावनाओं पर दोनों देशों के बीच गहन कूटनीतिक गतिविधि जारी है।

गालिबाफ का बयान: मिसाइलें ही असली ताकत

गालिबाफ ने एक्स पर लिखा, 'हमें बातचीत से नहीं, बल्कि मिसाइलों से छूट मिलती है; बातचीत में, हम बस उन्हें समझने लायक बनाते हैं।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान को किसी दूसरी गारंटी या मौखिक वचन पर कोई भरोसा नहीं है — केवल ठोस कार्रवाई ही कसौटी है।

उन्होंने कहा कि जब तक दूसरा पक्ष कोई ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक ईरान की ओर से भी कोई कार्रवाई नहीं होगी। गालिबाफ ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि किसी भी समझौते का असली विजेता वह होता है जो समझौते के अगले दिन से युद्ध के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो।

ट्रंप प्रशासन का दावा: दबाव की रणनीति काम आई

दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन ने दावा किया है कि उनके सैन्य और आर्थिक दबाव के अभियान ने ईरान को परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत की मेज़ पर लाने में सफलता दिलाई है। अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने व्हाइट हाउस में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि तेहरान अब उन मुद्दों पर बातचीत कर रहा है जिन पर पिछली अमेरिकी सरकारें उसे राजी नहीं कर पाई थीं।

बेसेंट ने कहा, 'राष्ट्रपति ट्रंप ने कुछ ऐसा किया है जो कोई दूसरी सरकार नहीं कर सकती। हमने ईरानियों से उनके परमाणु कार्यक्रम के बारे में बात करने और शायद इसे न करने का वादा करने के लिए राजी कर लिया है।'

अमेरिका की तीन अटल शर्तें

बेसेंट ने बताया कि ट्रंप प्रशासन ने किसी भी संभावित समझौते के लिए तीन ऐसी शर्तें रखी हैं जिन पर कोई समझौता नहीं होगा। पहली — तेहरान को अपना अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम सौंपना होगा। दूसरी — परमाणु हथियार बनाने की कोई भी कोशिश पूरी तरह छोड़नी होगी। तीसरी — होर्मुज़ जलडमरूमध्य से स्वतंत्र नौवहन फिर से सुनिश्चित करना होगा।

बेसेंट ने यह भी कहा, 'वह कोई बुरी डील नहीं करने जा रहे हैं। वह अमेरिकी लोगों के लिए एक बड़ी डील करने जा रहे हैं।'

ईरानी नेतृत्व में आंतरिक मतभेद

बेसेंट ने दावा किया कि तेहरान पर बढ़ते दबाव ने ईरानी नेतृत्व की निर्णय-प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। उन्होंने कहा कि ईरानी सरकार के तीन स्तंभ हैं — पहला, चुनी हुई सरकार; दूसरा, आईआरजीसी (IRGC); और तीसरा, सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई। उन्होंने कहा कि इन तीनों के बीच आपसी तालमेल बिठाकर बातचीत करना ईरान के लिए मुश्किल साबित हो रहा है।

आगे क्या होगा

गालिबाफ का यह बयान और बेसेंट की टिप्पणियाँ स्पष्ट करती हैं कि अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता अभी भी नाज़ुक दौर में है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हैं और किसी भी अंतिम समझौते की राह लंबी और कठिन दिखती है। विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले हफ्तों में होने वाले दौर की बातचीत यह तय करेगी कि दोनों देश किसी साझा ज़मीन पर पहुँच सकते हैं या नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि ईरान की दशकों पुरानी रणनीतिक सोच की स्पष्ट अभिव्यक्ति है — जो कहती है कि ताकत ही बातचीत की असली मुद्रा है। विरोधाभास यह है कि जिस वार्ता-मेज़ को गालिबाफ महज 'समझाने का मंच' बता रहे हैं, उसी पर बैठकर ईरान अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश कर रहा है। बेसेंट का 'सफल दबाव' का दावा भी अधूरा है — ईरान की बातचीत में भागीदारी और उसकी शर्तों पर सहमति दो अलग बातें हैं। जब तक तीनों अमेरिकी शर्तों पर ठोस प्रगति नहीं होती, यह वार्ता किसी समझौते से ज़्यादा दोनों देशों की घरेलू राजनीति की ज़रूरत पूरी करती दिखती है।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गालिबाफ ने मिसाइलों और बातचीत के बारे में क्या कहा?
ईरानी संसद स्पीकर गालिबाफ ने एक्स पर लिखा कि ईरान को रियायतें बातचीत से नहीं, बल्कि मिसाइल क्षमता से मिलती हैं। उनके अनुसार बातचीत केवल दूसरे पक्ष को ईरान की स्थिति समझाने का माध्यम है।
अमेरिका ने ईरान के साथ किसी भी परमाणु समझौते के लिए क्या शर्तें रखी हैं?
वित्त सचिव बेसेंट के अनुसार अमेरिका की तीन अटल शर्तें हैं — ईरान को अपना अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम सौंपना होगा, परमाणु हथियार बनाने की कोशिश पूरी तरह छोड़नी होगी, और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करना होगा।
ट्रंप प्रशासन ईरान वार्ता में अपनी रणनीति को सफल क्यों मान रहा है?
बेसेंट ने दावा किया कि सैन्य और आर्थिक दबाव के चलते ईरान उन परमाणु मुद्दों पर बात करने को तैयार हुआ है जिन पर पिछली अमेरिकी सरकारें उसे राजी नहीं कर पाई थीं। हालांकि, बातचीत में भागीदारी और अंतिम समझौते के बीच अभी बड़ा अंतर बना हुआ है।
ईरानी नेतृत्व में बातचीत को लेकर मतभेद क्यों हैं?
बेसेंट के अनुसार ईरानी सत्ता के तीन स्तंभ — चुनी हुई सरकार, IRGC और सुप्रीम लीडर खामेनेई — के बीच आपसी तालमेल बिठाना मुश्किल हो रहा है। इस आंतरिक जटिलता के कारण ईरान के लिए एकजुट होकर वार्ता करना चुनौतीपूर्ण है।
अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता में आगे क्या होने की संभावना है?
दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हैं और किसी अंतिम समझौते की राह अभी लंबी दिखती है। विश्लेषकों के अनुसार आने वाले दौर की वार्ता यह तय करेगी कि दोनों देश किसी साझा आधार पर पहुँच सकते हैं या नहीं।
राष्ट्र प्रेस
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