झारखंड हाईकोर्ट सख्त: बरी महिला को डिटेंशन सेंटर में रखने और कथित दुष्कर्म पर गृह सचिव तलब
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर 2026 को एक गंभीर मामले में राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया — जहाँ एक महिला को आपराधिक मामले में बरी हो जाने के बावजूद हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में बंद रखा गया और उसके साथ कथित तौर पर यौन शोषण व दुष्कर्म किया गया। अदालत ने मामले की गंभीरता देखते हुए झारखंड के गृह सचिव को 5 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है।
मामले का पूरा घटनाक्रम
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की खंडपीठ ने यह आदेश सामाजिक कार्यकर्ता अपूर्व विवेक की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया। महिला की पैरवी कर रहीं अधिवक्ता उज्जैनी चटर्जी ने अदालत को बताया कि उनकी मुवक्किल को एक आपराधिक मामले में न्यायालय ने पहले ही बरी कर दिया था, बावजूद इसके उसे हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में नज़रबंद रखा गया।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि 2020 से 2022 के बीच डिटेंशन सेंटर में तैनात पुलिस कांस्टेबल रंजीत महतो ने महिला के साथ कथित तौर पर लगातार यौन शोषण और दुष्कर्म किया। यह आरोप अत्यंत संगीन हैं और सरकारी संरक्षण में हिरासत के दुरुपयोग की ओर संकेत करते हैं।
संवैधानिक प्रश्न: अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
सुनवाई के दौरान अदालत ने सीधा सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया है, तो उसे किस कानूनी आधार पर हिरासत में रखा जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है, और कानून के वैध प्राधिकार के बिना किसी की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।
गौरतलब है कि बरी हो चुके व्यक्ति की अनिश्चितकालीन हिरासत न केवल कानूनी रूप से संदिग्ध है, बल्कि यह राज्य के सुरक्षात्मक दायित्व की घोर विफलता भी दर्शाती है।
अदालत के निर्देश और जाँच प्रक्रिया
अदालत ने झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (झालसा) के माध्यम से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए), हजारीबाग की एक टीम को महिला से सीधे बातचीत कर उसका बयान दर्ज करने का निर्देश दिया। टीम को अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश करने को कहा गया है — ताकि पीड़िता की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
सुनवाई के दौरान हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत से जुड़े और उन्होंने आरोपी पुलिस कांस्टेबल रंजीत महतो के विरुद्ध जाँच तथा महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया।
आम जनता और महिला सुरक्षा पर असर
यह मामला देश भर के डिटेंशन सेंटरों में बंद महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह ऐसे समय में आया है जब हिरासत में यौन हिंसा की घटनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बनी हुई हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे मामलों में न्यायिक निगरानी की सख्त ज़रूरत है।
आगे क्या होगा
अदालत ने अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को तय की है। उस दिन गृह सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य होगी, साथ ही डीएलएसए और हजारीबाग एसपी की रिपोर्ट भी अदालत के सामने रखी जाएगी। मामले का अगला चरण तय करेगा कि राज्य सरकार इस अभूतपूर्व संवैधानिक प्रश्न का जवाब दे पाती है या नहीं।