5 अक्टूबर 2026
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झारखंड हाईकोर्ट सख्त: बरी महिला को हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में रखने और दुष्कर्म के आरोप पर गृह सचिव तलब

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झारखंड हाईकोर्ट सख्त: बरी महिला को हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में रखने और दुष्कर्म के आरोप पर गृह सचिव तलब

सारांश

बरी होने के बाद भी हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में बंद महिला ने तीन पुलिसकर्मियों पर दुष्कर्म का आरोप लगाया। झारखंड हाईकोर्ट ने संवैधानिक अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए गृह सचिव को तलब किया — यह मामला डिटेंशन सेंटरों में बंदियों के अधिकारों पर बड़ा सवाल बन गया है।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 5 अक्टूबर 2026 को गृह सचिव वंदना दादेल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया।
महिला फॉरेनर्स एक्ट के तहत तीन वर्ष की सजा पूरी कर चुकी थी और आपराधिक मामले में बरी भी हो चुकी थी, फिर भी हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में रखी गई।
महिला ने अपने बयान में कांस्टेबल रंजीत महतो समेत तीन पुलिसकर्मियों पर दुष्कर्म का आरोप लगाया।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए हिरासत का कानूनी आधार माँगा।
डीएलएसए हजारीबाग की जाँच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी गई।
हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए जाँच और महिला की सुरक्षा का आश्वासन दिया।

झारखंड हाईकोर्ट ने 5 अक्टूबर 2026 को हजारीबाग स्थित डिटेंशन सेंटर में एक महिला को कथित तौर पर अवैध रूप से हिरासत में रखने और उसके साथ दुष्कर्म के आरोपों के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए गृह सचिव वंदना दादेल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया। उल्लेखनीय है कि महिला पहले ही एक आपराधिक मामले में बरी हो चुकी थी, फिर भी उसे हिरासत में रखा जा रहा था — एक तथ्य जिसने अदालत की तीखी टिप्पणियों को जन्म दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता अपूर्व विवेक की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से उत्पन्न हुआ है, जिसमें हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में महिला की हिरासत को चुनौती दी गई है। महिला की ओर से अधिवक्ता उज्जैनी चटर्जी ने अदालत को बताया कि महिला फॉरेनर्स एक्ट के तहत तीन वर्ष की सजा पूरी कर चुकी थी और एक आपराधिक मामले में बरी भी हो चुकी थी, इसके बावजूद उसे डिटेंशन सेंटर में रखा गया।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में सामने आया है जब देश में डिटेंशन सेंटरों में बंदियों के अधिकारों को लेकर कई अदालतें पहले भी सख्त रुख अपना चुकी हैं। इस मामले में आरोप और भी गंभीर हैं — महिला ने अपने बयान में कहा कि कांस्टेबल रंजीत महतो समेत तीन पुलिसकर्मियों ने उसके साथ दुष्कर्म किया।

अदालत में क्या हुआ

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (झालसा) की ओर से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए), हजारीबाग की जाँच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में प्राप्त की। इसी रिपोर्ट में महिला का वह बयान दर्ज है जिसमें उसने दुष्कर्म के आरोप लगाए हैं।

खंडपीठ ने राज्य सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा कि सजा पूरी होने और बरी होने के बाद भी महिला की हिरासत जारी रखने का कानूनी आधार क्या था। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है और कानून के वैध प्राधिकार के बिना किसी की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।

पुलिस का रुख और आश्वासन

हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल हुए और उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि आरोपी कांस्टेबल रंजीत महतो के विरुद्ध जाँच की जाएगी और महिला की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। हालाँकि, अदालत ने इस आश्वासन को पर्याप्त नहीं मानते हुए मामले की आगामी सुनवाई उसी दिन दोपहर 2 बजकर 15 मिनट पर निर्धारित की।

संवैधानिक सवाल और आगे की राह

यह मामला केवल एक महिला की हिरासत तक सीमित नहीं है — यह डिटेंशन सेंटरों में बंदियों के मूल अधिकारों, पुलिस जवाबदेही और राज्य की संवैधानिक ज़िम्मेदारी पर गहरे सवाल उठाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की ओर से पेश जवाब और उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर वह आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेगी।

यह मामला झारखंड सरकार के लिए बड़ी कानूनी और प्रशासनिक चुनौती बन गया है, और अदालत के अगले आदेश पर पूरे राज्य की नज़रें टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि पूरे डिटेंशन सेंटर प्रणाली की जवाबदेही का है — जहाँ बंदियों की निगरानी के तंत्र अक्सर लचर होते हैं। बरी होने के बाद भी हिरासत में रखना अनुच्छेद 21 का स्पष्ट उल्लंघन है, और यदि दुष्कर्म के आरोप सिद्ध होते हैं तो यह राज्य की संस्थागत विफलता का गंभीर उदाहरण बनेगा। गृह सचिव का व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होना दर्शाता है कि न्यायपालिका इस मामले को महज प्रशासनिक चूक नहीं मान रही। असली परीक्षा अब यह है कि राज्य सरकार केवल आश्वासन देती है या जवाबदेही की ठोस कार्रवाई करती है।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट का यह मामला क्या है?
यह मामला हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में बंद एक महिला से जुड़ा है, जिसे फॉरेनर्स एक्ट के तहत तीन वर्ष की सजा पूरी करने और आपराधिक मामले में बरी होने के बाद भी कथित तौर पर अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। महिला ने तीन पुलिसकर्मियों पर दुष्कर्म का आरोप भी लगाया है।
गृह सचिव वंदना दादेल को हाईकोर्ट में क्यों तलब किया गया?
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से महिला की हिरासत का कानूनी आधार और दुष्कर्म के आरोपों पर स्पष्ट जवाब माँगा था। अदालत के सख्त निर्देश के बाद गृह सचिव वंदना दादेल 5 अक्टूबर 2026 को व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में पेश हुईं।
महिला ने किन पर दुष्कर्म का आरोप लगाया है?
डीएलएसए हजारीबाग की जाँच रिपोर्ट के अनुसार, महिला ने अपने बयान में कांस्टेबल रंजीत महतो समेत तीन पुलिसकर्मियों पर दुष्कर्म का आरोप लगाया है। हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक ने आरोपी के विरुद्ध जाँच का आश्वासन दिया है।
अदालत ने संविधान के किस अनुच्छेद का हवाला दिया?
खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया, जो प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अदालत ने कहा कि कानून के वैध प्राधिकार के बिना किसी की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।
इस मामले में आगे क्या होगा?
अदालत ने उसी दिन दोपहर 2 बजकर 15 मिनट पर अगली सुनवाई निर्धारित की थी। राज्य सरकार के जवाब और सीलबंद रिपोर्ट के आधार पर खंडपीठ आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेगी।
राष्ट्र प्रेस
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