जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने 2019 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से छूट का प्रस्ताव पारित किया
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने 24 सितंबर 2026 को एक अहम प्रस्ताव पारित किया, जिसके तहत 31 अक्टूबर 2019 से पहले नियुक्त शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता से राहत देने की सिफारिश की गई है। विधायकों ने इन शिक्षकों की नौकरी की असुरक्षा, मानसिक तनाव और पेशेवर सम्मान को ठेस पहुँचाने वाली इस शर्त पर गंभीर चिंता जताई।
प्रस्ताव की पृष्ठभूमि
जम्मू-कश्मीर में वर्षों से सेवारत शिक्षकों पर टीईटी पास करने की शर्त तब लागू हुई जब जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के बाद क्षेत्र में राष्ट्रीय शिक्षा कानूनों का विस्तार हुआ। शिक्षकों का तर्क है कि 2019 से पहले यह क्षेत्र एक अलग संवैधानिक ढाँचे के अंतर्गत संचालित होता था, जिसमें राइट टू एजुकेशन (आरटीई) अधिनियम, 2009 के प्रावधान भिन्न रूप में लागू किए गए थे।
इसके अलावा, उस समय की भर्ती प्रक्रियाएँ केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद लागू हुए मानकों से मेल नहीं खाती थीं। शिक्षकों का कहना है कि उन्हें कभी भी नियमित अंतराल पर टीईटी देने का अवसर, प्रशासनिक ढाँचा या पर्याप्त समय नहीं दिया गया।
शिक्षकों की मुख्य आपत्तियाँ
10 से 25 वर्षों तक अध्यापन कर चुके अनुभवी शिक्षकों के लिए एंट्री-लेवल प्रतियोगी परीक्षा की अनिवार्यता को पेशेवर अपमान के रूप में देखा जा रहा था। उनके अनुसार, यह शर्त उनके दशकों के कार्यानुभव और सेवा रिकॉर्ड को सिरे से नजरअंदाज करती है।
एम.एड. या पीएचडी जैसी उन्नत शोध उपाधियाँ रखने वाले शिक्षकों को रटकर याद करने वाली प्रतियोगी परीक्षा के लिए तैयारी करना अव्यावहारिक और अनुचित लगा। शिक्षकों ने यह भी बताया कि वे पहले से ही कक्षाओं के अतिरिक्त चुनाव ड्यूटी, जनगणना और अन्य सरकारी कार्यक्रमों के बोझ तले दबे हैं, जिससे परीक्षा की तैयारी के लिए समय निकाल पाना और भी कठिन हो जाता था।
प्रमोशन और सेवानिवृत्ति पर असर
आलोचकों का कहना है कि प्रशासन टीईटी की शर्त का उपयोग एक प्रशासनिक फिल्टर के रूप में कर रहा था। यहाँ तक कि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में 5 वर्ष से कम समय बचा था और उन्हें जबरन सेवानिवृत्ति से छूट मिली हुई थी, उनके लिए भी लंबे समय से रुके प्रमोशन और वेतनमान वृद्धि के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य कर दिया गया था।
यह ऐसे समय में आया है जब देश के कई राज्यों में पहले से सेवारत शिक्षकों को इस प्रकार की परीक्षाओं से मुक्त रखा गया है, जिससे जम्मू-कश्मीर के शिक्षकों में निष्पक्षता को लेकर गहरी चिंता थी।
प्रस्ताव का महत्त्व और आगे की राह
विधानसभा में यह प्रस्ताव पारित होना इस मुद्दे पर नीतिगत विचार-विमर्श की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। गौरतलब है कि प्रस्ताव की प्रकृति सिफारिशी है और अब इस पर सक्षम स्तर पर कार्यकारी या प्रशासनिक निर्णय लिया जाना आवश्यक है।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इस प्रस्ताव को अमल में लाया गया तो जम्मू-कश्मीर के हजारों सेवारत शिक्षकों को नौकरी की अनिश्चितता से राहत मिलेगी और वे कक्षाओं में बेहतर ध्यान दे सकेंगे। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि प्रशासन इस प्रस्ताव को कब और किस रूप में क्रियान्वित करता है।