फर्जी सर्विस बुक घोटाला: J&K क्राइम ब्रांच ने बांदीपोरा मामले में दाखिल की चार्जशीट
सारांश
Key Takeaways
- जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच की EOW ने FIR नंबर 46/2023 में एंटी-करप्शन कोर्ट, बारामूला में चार्जशीट दाखिल की।
- नासिर अहमद मीर ने 1994 के SRO-43 के तहत जाली नियुक्ति आदेश से PDD में नौकरी हासिल की थी।
- KPDCL कर्मचारी मुश्ताक अहमद मलिक ने फर्जी सर्विस बुक तैयार की, जिसकी पुष्टि फोरेंसिक जांच ने की।
- दिवंगत एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने 2009 में बिना सत्यापन के नियुक्ति के तीन साल बाद वेतन जारी करवाया।
- आरोपियों पर RPC धारा 420, 468, 471, 120-B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलेगा।
- तहसीलदार सत्यापन में मीर SRO-43 के लिए अपात्र पाए गए थे।
श्रीनगर, 25 अप्रैल। जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) ने पावर डेवलपमेंट डिपार्टमेंट (PDD) में फर्जी सर्विस बुक और जाली नियुक्ति आदेश के जरिए सरकारी नौकरी हथियाने के मामले में एंटी-करप्शन कोर्ट, बारामूला में चार्जशीट दाखिल कर दी है। यह चार्जशीट FIR नंबर 46/2023 के तहत दर्ज मामले में तीन आरोपियों के विरुद्ध पेश की गई है, जिनमें एक दिवंगत पूर्व सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा प्रकरण एक लिखित शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें पावर डेवलपमेंट डिपार्टमेंट में फर्जी नियुक्तियों का गंभीर आरोप लगाया गया था। जांच में सामने आया कि कुनान बाबागुंड, बांदीपोरा निवासी नासिर अहमद मीर ने एक जाली नियुक्ति आदेश के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल की, जिसे कथित तौर पर 1994 के SRO-43 के तहत जारी बताया गया था।
जांच टीम ने पाया कि वह नियुक्ति आदेश सरकारी अभिलेखों में कहीं भी मौजूद नहीं था, जिससे उसकी प्रामाणिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया। यह खुलासा इस बात का संकेत था कि दस्तावेज़ पूरी तरह मनगढ़ंत थे।
जाली दस्तावेज़ और आरोपियों की भूमिका
अरागम, बांदीपोरा निवासी और KPDCL में कार्यरत मुश्ताक अहमद मलिक, जो उस समय सीनियर असिस्टेंट के पद पर थे, ने नासिर अहमद मीर के लिए एक जाली सर्विस बुक तैयार की। इस सर्विस बुक में गलत तरीके से दर्ज किया गया कि मीर की नियुक्ति SRO-43 के अंतर्गत हुई है।
फोरेंसिक जांच ने इस बात की पुष्टि की कि सर्विस बुक की सभी प्रविष्टियां और हस्ताक्षर मुश्ताक अहमद मलिक के ही हैं। इसके अतिरिक्त, कथित नियुक्ति आदेश के जारी होने से संबंधित कोई भी सरकारी डिस्पैच या रसीद का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
उस समय के तहसीलदार, बांदीपोरा द्वारा किए गए सत्यापन से भी यह स्पष्ट हुआ कि नासिर अहमद मीर SRO-43 के तहत नियुक्ति के लिए पात्र ही नहीं थे, क्योंकि उनके परिवार की परिस्थितियां इस श्रेणी की अर्हता को पूरा नहीं करती थीं।
दिवंगत अधिकारी की संलिप्तता
जांच में यह भी उजागर हुआ कि KPDCL/ED सुंबल के एक दिवंगत पूर्व एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, जो जम्मू के निवासी थे, ने 2009 में — यानी कथित नियुक्ति की तारीख के तीन वर्ष से भी अधिक समय बाद — बिना किसी उचित सत्यापन के नासिर अहमद मीर का वेतन जारी करवाने में मदद की।
यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इतने लंबे अंतराल के बाद वेतन स्वीकृत करना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के विरुद्ध था और इसमें जानबूझकर की गई अनदेखी की संभावना स्पष्ट दिखती है।
आरोप और कानूनी कार्रवाई
जांच में आरोपियों के बीच एक सुनियोजित आपराधिक साजिश का खुलासा हुआ, जिसमें जालसाजी, धोखाधड़ी और सरकारी पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर कृत्य शामिल हैं। तदनुसार आरोपियों पर RPC की धारा 420, 468, 471 और 120-B के तहत आरोप लगाए गए हैं।
सरकारी कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत भी मुकदमा चलाया जाएगा। चार्जशीट को न्यायिक निर्णय के लिए एंटी-करप्शन कोर्ट, बारामूला में विधिवत जमा कर दिया गया है।
व्यापक संदर्भ और प्रभाव
गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में सरकारी विभागों में फर्जी नियुक्तियों के मामले पिछले कुछ वर्षों में लगातार सामने आते रहे हैं। SRO-43 जैसी विशेष श्रेणियां, जो मूल रूप से वंचित परिवारों की मदद के लिए बनाई गई थीं, उनका दुरुपयोग कर अपात्र लोगों को नौकरी दिलाने की यह कोई पहली घटना नहीं है।
क्राइम ब्रांच की यह कार्रवाई उस व्यापक भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान का हिस्सा है जो जम्मू-कश्मीर में केंद्र शासन के बाद से तेज हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में त्वरित न्यायिक कार्रवाई न केवल दोषियों को दंडित करती है, बल्कि भविष्य में इस तरह की धोखाधड़ी पर अंकुश भी लगाती है।
अब सभी की निगाहें एंटी-करप्शन कोर्ट, बारामूला पर टिकी हैं, जहां इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी और दोषसिद्धि की स्थिति में आरोपियों को कठोर दंड का सामना करना पड़ सकता है।