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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को फटकारा: पिता से बच्ची लाने पुलिस भेजना 'न्यायिक संवेदनहीनता'

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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को फटकारा: पिता से बच्ची लाने पुलिस भेजना 'न्यायिक संवेदनहीनता'

सारांश

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने श्रीनगर की फैमिली कोर्ट को उस आदेश पर कड़ी फटकार लगाई जिसमें पाँच साल की बच्ची को पिता से लाने के लिए पुलिस भेजी गई थी। न्यायमूर्ति राहुल भारती ने इसे कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण और न्यायिक संवेदनहीनता का उदाहरण बताया।

मुख्य बातें

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने श्रीनगर की फैमिली कोर्ट को पाँच वर्षीय बच्ची को पिता से लाने के लिए पुलिस भेजने पर कड़ी फटकार लगाई।
न्यायमूर्ति राहुल भारती ने फैमिली कोर्ट के 29 जून 2026 के आदेश को एकतरफा और कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण करार दिया।
दोनों पक्षों के बीच 25 जनवरी 2025 के तलाक समझौते में यह शर्त थी कि माँ के पुनर्विवाह पर बच्ची की कस्टडी पिता को मिलेगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि सर्च वारंट जारी करने का अधिकार फैमिली कोर्ट को नहीं, बल्कि जिला मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को होता है।
अदालत ने सुझाया कि बच्ची की वापसी के लिए महिला पुलिस सेल जैसे संवेदनशील माध्यमों का उपयोग होना चाहिए था।

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने श्रीनगर की एक फैमिली कोर्ट को कड़ी फटकार लगाई है, जिसने एक पाँच वर्षीय बच्ची को उसके पिता से वापस लाने के लिए पुलिस को सर्च वारंट के साथ भेजा था। न्यायमूर्ति राहुल भारती ने अपने फैसले में निचली अदालत के इस कदम को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण और न्यायिक संवेदनहीनता का उदाहरण करार दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद शादाब हुसैन मीर द्वारा संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका से उत्पन्न हुआ। याचिकाकर्ता और उनकी पूर्व पत्नी ने 25 जनवरी 2025 को आपसी सहमति से तलाक लिया था। इस समझौते में बच्ची की कस्टडी माँ को दी गई थी, किंतु एक महत्त्वपूर्ण शर्त भी जोड़ी गई थी — यदि माँ पुनर्विवाह करती है, तो बच्ची की कस्टडी स्वतः पिता को हस्तांतरित हो जाएगी।

माँ के दोबारा विवाह करने के पश्चात पिता ने समझौते की उक्त शर्त के अनुसार बच्ची को अपने पास रख लिया। इस पर माँ ने श्रीनगर की चौथी अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फैमिली कोर्ट) के समक्ष याचिका दायर की।

फैमिली कोर्ट का विवादास्पद आदेश

29 जून 2026 को फैमिली कोर्ट ने चनापोरा पुलिस थाने के एसएचओ को निर्देश दिया कि वे सर्च वारंट लागू करें, बच्ची को बरामद करें और उसे माँ को सौंपें। हाईकोर्ट ने इस आदेश को एकतरफा और विधिक प्रक्रिया के विरुद्ध माना।

न्यायमूर्ति भारती ने स्पष्ट किया कि पिता का पक्ष सुने बिना और तथ्यों की समुचित जाँच किए बिना सर्च वारंट जारी करना न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि केवल पिता के पास बच्ची की कस्टडी होना अपने आप में गैरकानूनी नहीं माना जा सकता, विशेषकर जब यह दोनों पक्षों के बीच हुए लिखित समझौते पर आधारित हो।

हाईकोर्ट की कानूनी आपत्तियाँ

न्यायमूर्ति भारती ने एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी उठाया — क्या फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 100 के अंतर्गत सर्च वारंट जारी करने का अधिकार है? उन्होंने स्पष्ट किया कि यह शक्ति केवल जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के पास होती है — फैमिली कोर्ट के पास नहीं।

गौरतलब है कि यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब बाल-कस्टडी विवादों में अदालतों की संवेदनशीलता और प्रक्रियागत सावधानी पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।

बच्चे के हित में संवेदनशील दृष्टिकोण की माँग

न्यायमूर्ति भारती ने कहा कि यदि बच्ची को वापस लाना वास्तव में आवश्यक था, तो इसके लिए स्थानीय पुलिस थाने को भेजने के बजाय महिला पुलिस सेल या अन्य संवेदनशील एवं उचित माध्यमों का सहारा लिया जाना चाहिए था। एक नाबालिग बच्ची के घर पुलिस भेजना उसके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

आगे क्या होगा

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज करते हुए मामले की आगे की सुनवाई के निर्देश दिए हैं। यह फैसला भविष्य में बाल-कस्टडी मामलों में निचली अदालतों के लिए एक महत्त्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, जो यह रेखांकित करता है कि बच्चों से जुड़े विवादों में प्रक्रियागत सावधानी और न्यायिक संवेदनशीलता अनिवार्य है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि बच्चे के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य के प्रति गंभीर असंवेदनशीलता भी है। हाईकोर्ट ने सर्च वारंट की वैधानिक सीमाओं पर जो प्रश्न उठाया है, वह देशभर की फैमिली कोर्टों के लिए एक ज़रूरी पुनर्विचार का निमंत्रण है।
RashtraPress
23 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को किस बात पर फटकारा?
हाईकोर्ट ने श्रीनगर की फैमिली कोर्ट को इसलिए फटकारा क्योंकि उसने पाँच वर्षीय बच्ची को उसके पिता से वापस लाने के लिए पुलिस को सर्च वारंट के साथ भेजा था। न्यायमूर्ति राहुल भारती ने इसे कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण और न्यायिक संवेदनहीनता का उदाहरण बताया।
इस मामले में बच्ची की कस्टडी का विवाद कैसे शुरू हुआ?
याचिकाकर्ता शादाब हुसैन मीर और उनकी पूर्व पत्नी ने 25 जनवरी 2025 को आपसी सहमति से तलाक लिया था। समझौते में बच्ची की कस्टडी माँ को दी गई थी, लेकिन यह शर्त थी कि माँ के पुनर्विवाह पर कस्टडी पिता को मिलेगी। माँ के दोबारा विवाह करने के बाद पिता ने बच्ची को अपने पास रख लिया।
क्या फैमिली कोर्ट को सर्च वारंट जारी करने का अधिकार है?
न्यायमूर्ति राहुल भारती के अनुसार, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 100 के तहत सर्च वारंट जारी करने का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को होता है — फैमिली कोर्ट को नहीं। हाईकोर्ट ने इसी बिंदु पर फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट की शक्तियों पर प्रश्न उठाया है।
हाईकोर्ट ने बच्ची की वापसी के लिए क्या विकल्प सुझाया?
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि बच्ची को वापस लाना आवश्यक था, तो स्थानीय पुलिस थाने के बजाय महिला पुलिस सेल या अन्य संवेदनशील एवं उचित माध्यमों का उपयोग किया जाना चाहिए था। एक नाबालिग बच्ची के लिए यह दृष्टिकोण उसके मानसिक और भावनात्मक हित में अधिक उपयुक्त होता।
इस फैसले का भविष्य के बाल-कस्टडी मामलों पर क्या असर होगा?
यह फैसला निचली अदालतों के लिए एक महत्त्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है कि बाल-कस्टडी विवादों में दोनों पक्षों का पक्ष सुने बिना एकतरफा आदेश पारित नहीं किए जा सकते। साथ ही यह रेखांकित करता है कि बच्चों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता और प्रक्रियागत सावधानी अनिवार्य है।
राष्ट्र प्रेस
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