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रीता भादुड़ी: 'जूली' से 'निमकी मुखिया' तक, 70 फिल्मों में छाप छोड़ने वाली अभिनेत्री

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रीता भादुड़ी: 'जूली' से 'निमकी मुखिया' तक, 70 फिल्मों में छाप छोड़ने वाली अभिनेत्री

सारांश

हीरोइन बनने का सपना, लेकिन किरदारों में जान डालने की ऐसी कला कि दर्शक उन्हें अपना मान बैठे। रीता भादुड़ी का सफर 'जूली' की दोस्त से 'निमकी मुखिया' की दादी तक — 70 फिल्में, 20 धारावाहिक, और एक ऐसी विरासत जो बिना सुर्खियों के बनी।

मुख्य बातें

रीता भादुड़ी का जन्म 4 नवंबर 1955 को हुआ; उन्होंने FTII पुणे से अभिनय प्रशिक्षण लिया।
करियर की शुरुआत 1968 में फिल्म 'तेरी तलाश में' से; 1975 में 'जूली' से व्यापक पहचान मिली।
1976 में 'लाखो फुलानी' के बाद करीब 8 वर्षों तक गुजराती सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्री रहीं।
कुल 70 से अधिक फिल्मों और 20 से ज़्यादा टीवी धारावाहिकों में अभिनय; फिल्म 'राजा' के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री नामांकन।
17 जुलाई 2018 को मुंबई में 62 वर्ष की आयु में डायबिटीज और किडनी रोग के कारण निधन।

बॉलीवुड में रीता भादुड़ी उन चुनिंदा कलाकारों में शुमार थीं जो मुख्य भूमिका की चकाचौंध से दूर रहकर भी अपने हर किरदार को अमिट बना देती थीं। 4 नवंबर 1955 को जन्मी रीता ने करीब पाँच दशकों के करियर में 70 से अधिक फिल्मों और 20 से ज़्यादा टीवी धारावाहिकों में काम किया और 17 जुलाई 2018 को 62 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कहा। हीरोइन बनने का सपना लेकर इंडस्ट्री में आई रीता को वह मुकाम भले ही न मिला हो, लेकिन उनकी सहज और विश्वसनीय अदाकारी ने उन्हें दर्शकों के दिलों में स्थायी जगह दिलाई।

शुरुआती जीवन और प्रशिक्षण

रीता भादुड़ी को अभिनय का संस्कार विरासत में मिला — उनकी माँ भी फिल्मों में काम कर चुकी थीं। बचपन से ही कैमरे की दुनिया की ओर खिंचाव रखने वाली रीता ने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से विधिवत अभिनय प्रशिक्षण लिया। यह संस्थान भारतीय सिनेमा के कई दिग्गजों की पाठशाला रहा है, और रीता ने वहाँ से जो नींव तैयार की वह उनके पूरे करियर में झलकती रही।

फिल्मी करियर: 'जूली' से पहचान, गुजराती सिनेमा में नाम

रीता ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत 1968 में फिल्म 'तेरी तलाश में' से की। 1974 में आई फिल्म 'आइना' में उन्हें राजेश खन्ना और मुमताज जैसे बड़े सितारों के साथ काम करने का अवसर मिला। हालाँकि उनकी भूमिका सीमित थी, उनकी स्क्रीन उपस्थिति ने ध्यान आकर्षित किया।

1975 में प्रदर्शित सुपरहिट फिल्म 'जूली' उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। इसमें उन्होंने मुख्य किरदार की सखी की भूमिका निभाई और उन पर फिल्माया गया गीत 'ये रातें नई पुरानी' श्रोताओं में खासा लोकप्रिय हुआ। इसके बाद 'सावन को आने दो', 'अनुरोध', 'बेटा', 'हम आपके हैं कौन', 'राजा', 'क्या कहना', 'कभी हाँ कभी ना' और 'दिल विल प्यार व्यार' जैसी फिल्मों में उनकी सहायक भूमिकाएँ दर्शकों को याद रहीं।

गौरतलब है कि हिंदी सिनेमा के समानांतर रीता ने गुजराती फिल्म इंडस्ट्री में भी अपनी अलग पहचान बनाई। 1976 में आई गुजराती फिल्म 'लाखो फुलानी' की सफलता के बाद वह करीब आठ वर्षों तक गुजराती सिनेमा की लोकप्रिय अग्रणी अभिनेत्री रहीं — एक ऐसा अध्याय जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देती है।

छोटे पर्दे पर मजबूत मौजूदगी

1990 के दशक में जब टेलीविजन का युग आया, रीता भादुड़ी ने छोटे पर्दे पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी', 'साराभाई वर्सेस साराभाई', 'कुमकुम', 'अमानत', 'ससुराल गेंदा फूल' और 'निमकी मुखिया' जैसे धारावाहिकों में उनके अभिनय को दर्शकों और आलोचकों दोनों ने सराहा। विशेष रूप से 'निमकी मुखिया' में दादी का किरदार उनके अंतिम और सबसे यादगार रोल्स में गिना जाता है।

रीता की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि माँ, बहन या परिवार की समझदार महिला — हर किरदार में वह इतनी सहजता से ढल जाती थीं कि दर्शकों को वह अपने घर की सदस्य जैसी लगती थीं। यह सहजता किसी पुरस्कार से कम नहीं थी।

पुरस्कार और सम्मान

फिल्म 'राजा' में उनके अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार के लिए नामांकन प्राप्त हुआ था। यह नामांकन इस बात का प्रमाण था कि इंडस्ट्री ने उनकी प्रतिभा को स्वीकार किया, भले ही मुख्य भूमिकाएँ उनके हिस्से कम आईं।

निजी जीवन और अंतिम दिन

अपने करियर की सफलता के बावजूद रीता भादुड़ी ने निजी जीवन में एकाकी रहने का चुनाव किया और उन्होंने कभी विवाह नहीं किया। जीवन के अंतिम वर्षों में वह डायबिटीज और किडनी की गंभीर बीमारी से जूझती रहीं। इलाज के लिए उन्हें मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ 17 जुलाई 2018 को उन्होंने अंतिम साँस ली। उनका जाना हिंदी और गुजराती सिनेमा दोनों के लिए एक अपूरणीय क्षति था — एक ऐसी अभिनेत्री जिसने बिना किसी शोर के दशकों तक अपनी कला से पर्दे को समृद्ध किया।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उद्योग की अर्थव्यवस्था और मीडिया का ध्यान उन्हें हाशिये पर रखता है। गुजराती सिनेमा में आठ साल की अग्रणी भूमिका — जो मुख्यधारा की चर्चा में लगभग अनुपस्थित रहती है — यह बताती है कि क्षेत्रीय प्रतिभा को राष्ट्रीय पहचान के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। FTII जैसे संस्थान से प्रशिक्षित होने के बावजूद उन्हें मुख्य भूमिकाएँ न मिलना यह सवाल उठाता है कि इंडस्ट्री में प्रतिभा और अवसर का वितरण किस आधार पर होता है। उनकी विरासत इस बात का प्रमाण है कि दीर्घकालिक प्रासंगिकता चमक-दमक से नहीं, बल्कि शिल्प की गहराई से आती है।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रीता भादुड़ी कौन थीं और उन्होंने किन फिल्मों में काम किया?
रीता भादुड़ी एक वरिष्ठ हिंदी और गुजराती फिल्म अभिनेत्री थीं जिन्होंने 70 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'जूली' (1975), 'हम आपके हैं कौन', 'बेटा', 'राजा' और 'क्या कहना' शामिल हैं।
रीता भादुड़ी का निधन कब और कैसे हुआ?
रीता भादुड़ी का निधन 17 जुलाई 2018 को मुंबई में 62 वर्ष की आयु में हुआ। वह लंबे समय से डायबिटीज और किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं और इलाज के दौरान अस्पताल में उनका देहांत हुआ।
रीता भादुड़ी को किस फिल्म के लिए फिल्मफेयर नामांकन मिला था?
रीता भादुड़ी को फिल्म 'राजा' में उनके अभिनय के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार के लिए नामांकन प्राप्त हुआ था। यह उनके करियर की एक महत्वपूर्ण आधिकारिक स्वीकृति थी।
रीता भादुड़ी ने गुजराती सिनेमा में क्या योगदान दिया?
1976 में आई गुजराती फिल्म 'लाखो फुलानी' की सफलता के बाद रीता भादुड़ी करीब आठ वर्षों तक गुजराती सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्री रहीं। उन्होंने वहाँ बतौर लीड एक्ट्रेस कई हिट फिल्में दीं, जो हिंदी सिनेमा की उनकी पहचान से अलग एक स्वतंत्र विरासत है।
'निमकी मुखिया' में रीता भादुड़ी का किरदार क्यों यादगार माना जाता है?
'निमकी मुखिया' में रीता भादुड़ी ने दादी की भूमिका निभाई जो उनके करियर के अंतिम और सबसे चर्चित किरदारों में से एक है। उनकी सहज अभिनय शैली ने इस किरदार को दर्शकों के बीच घर के बुज़ुर्ग सदस्य जैसी आत्मीयता दी।
राष्ट्र प्रेस
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