16 जुलाई 2026
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ईरान को रोकने के लिए कूटनीति नहीं, सख्त दबाव ज़रूरी; पाकिस्तान निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं: इजरायली विशेषज्ञ डॉ. बेनलेवी

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ईरान को रोकने के लिए कूटनीति नहीं, सख्त दबाव ज़रूरी; पाकिस्तान निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं: इजरायली विशेषज्ञ डॉ. बेनलेवी

सारांश

इजरायली थिंक टैंक मिसगाव इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो डॉ. राफेल बेनलेवी का दो-टूक — ईरान के साथ कूटनीति समय की बर्बादी है, पाकिस्तान इस संघर्ष में इजरायल-विरोधी खेमे का हिस्सा है, और चीन संकट में ईरान को अकेला छोड़ देगा। सैन्य प्रतिरोध और अधिकतम दबाव ही एकमात्र रास्ता।

मुख्य बातें

इजरायली विशेषज्ञ डॉ.
राफेल बेनलेवी ने 16 जुलाई 2026 को राष्ट्र प्रेस को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कहा कि ईरान को रोकने के लिए कूटनीति नाकाफी है।
पाकिस्तान को ईरान-इजरायल संघर्ष में निष्पक्ष मध्यस्थ मानने से इनकार — बेनलेवी के अनुसार वह इजरायल-विरोधी खेमे में खड़ा है।
इजरायली हमलों से ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को गंभीर नुकसान, लेकिन बैलिस्टिक मिसाइलें और संवर्धित यूरेनियम अब भी मौजूद।
राष्ट्रपति ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति को विशेषज्ञ की मंज़ूरी; ईरान को परमाणु हथियार बनाने देने वाला कोई समझौता अस्वीकार्य।
चीन ईरान को तकनीकी व आर्थिक सहयोग देता है, लेकिन बड़े संघर्ष में सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं करेगा।

इजरायल के प्रमुख थिंक टैंक मिसगाव इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी के सीनियर फेलो डॉ. राफेल बेनलेवी ने 16 जुलाई 2026 को राष्ट्र प्रेस को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में स्पष्ट किया कि ईरान को परमाणु और मिसाइल महत्वाकांक्षाओं से विरत करने के लिए कूटनीति नहीं, बल्कि सैन्य प्रतिरोध और कठोर आर्थिक दबाव ही एकमात्र कारगर रणनीति है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान इस संघर्ष में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाने में सक्षम नहीं है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता पर इजरायल का स्पष्ट इनकार

अमेरिका द्वारा ईरान पर हालिया हवाई हमलों के बाद इस्लामाबाद ने एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका निभाने की इच्छा जताई है। लेकिन डॉ. बेनलेवी ने इसे सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा, "इजरायल नहीं मानता कि पाकिस्तान इस क्षेत्र में सफल मॉडरेटर या मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। इजरायली इलाका हो या फिर मिडिल ईस्ट क्षेत्र, वह हमेशा इजरायल विरोधी ताकतों के साथ खड़ा रहा है।"

उन्होंने आगे जोड़ा, "वह ऐसे कई क्षेत्रीय समूहों और देशों के करीब है, जो इजरायल के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख रखते हैं, इसलिए वह ईरान और अमेरिका या इजरायल के बीच किसी प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभा सकता। इस व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में पाकिस्तान एक पक्ष है और वह इजरायल के विपरीत खेमे में खड़ा दिखाई देता है।"

ईरान की सैन्य क्षमता को नुकसान, लेकिन खतरा बरकरार

डॉ. बेनलेवी ने माना कि हालिया इजरायली हमलों ने ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को उल्लेखनीय क्षति पहुँचाई है। उन्होंने कहा, "इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों, वैज्ञानिकों और मिसाइल अवसंरचना को निशाना बनाकर उसकी सैन्य क्षमता को काफी हद तक कमज़ोर कर दिया है।"

हालाँकि उन्होंने चेताया कि खतरा पूरी तरह टला नहीं है। उनके अनुसार, "ईरान के पास अब भी बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हैं और संवर्धित यूरेनियम भी है, जो फिलहाल भूमिगत ठिकानों में है। इसलिए दीर्घकाल में खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।" गौरतलब है कि यह ऐसे समय में कहा गया है जब अमेरिका और इजरायल दोनों संघर्ष के अगले चरण को लेकर रणनीतिक विकल्प तौल रहे हैं।

कूटनीति नहीं, अधिकतम दबाव ही रास्ता

ईरान के साथ बातचीत की संभावना पर डॉ. बेनलेवी ने कहा, "मौजूदा ईरानी शासन एक वैचारिक और क्रांतिकारी व्यवस्था है, जिसने हमेशा कूटनीति का इस्तेमाल केवल समय हासिल करने, प्रतिबंधों से राहत पाने और अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए किया है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि यह शासन क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करने की बजाय अपना प्रभाव विस्तार चाहता है, इसलिए "केवल सैन्य शक्ति और कठोर दबाव ही उसे रोक सकते हैं।"

यह विश्लेषण ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब पिछले 25 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय कूटनीतिक माध्यमों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने की कोशिश करता रहा है — और हर बार परिणाम सीमित रहे हैं।

ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति और अमेरिकी रणनीति

अमेरिकी नीति पर टिप्पणी करते हुए डॉ. बेनलेवी ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरानी शासन की प्रकृति को समझते हैं और उनकी 'मैक्सिमम प्रेशर' (अधिकतम दबाव) नीति इसी सोच पर आधारित है। उनके अनुसार ट्रंप पूर्ण युद्ध नहीं चाहते, लेकिन यदि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ाता रहा या अमेरिकी हितों तथा सहयोगियों पर हमले जारी रखता है, तो अमेरिका बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई भी कर सकता है।

उन्होंने कहा कि हालिया अमेरिकी हवाई हमले ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमज़ोर करने के लिए किए गए हैं, जिनका इस्तेमाल वह तेल टैंकरों और पड़ोसी देशों पर हमलों में कर रहा है। ट्रंप प्रशासन ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जिससे ईरान के लिए परमाणु हथियार बनाने का रास्ता खुला रहे।

चीन की भूमिका: समर्थन अब, संकट में किनारा

चीन-ईरान संबंधों पर डॉ. बेनलेवी ने कहा कि चीन कई वर्षों से ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को तकनीक, कच्चे माल और आर्थिक सहयोग के ज़रिए समर्थन देता रहा है। चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है, जिससे ईरान को आर्थिक मज़बूती मिलती है। हालाँकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इजरायल और अमेरिका के साथ बड़ा संघर्ष होता है, तो चीन सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं करेगा — बल्कि ईरान को उसके हाल पर छोड़ देगा और बाद में पुनर्निर्माण में मदद करेगा।

निष्कर्ष में डॉ. बेनलेवी ने दोहराया कि जब तक ईरान अपने परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय विस्तारवादी नीति से पीछे नहीं हटता, तब तक सैन्य प्रतिरोध और कठोर आर्थिक दबाव ही सबसे प्रभावी रणनीति बने रहेंगे। आने वाले हफ्तों में अमेरिका और इजरायल की अगली रणनीतिक चाल पर दुनिया की नज़रें टिकी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक बड़े सवाल को अनुत्तरित छोड़ता है — यदि कूटनीति विफल है और सैन्य दबाव ने भी ईरान को पूरी तरह नहीं रोका, तो दीर्घकालिक स्थिरता का रास्ता क्या है? पाकिस्तान को खारिज करना राजनीतिक दृष्टि से सुविधाजनक है, लेकिन इससे यह प्रश्न उठता है कि क्षेत्र में कोई स्वीकार्य मध्यस्थ बचता ही कौन है। चीन की 'दूरी बनाए रखो, बाद में पुनर्निर्माण करो' रणनीति बताती है कि बीजिंग इस संघर्ष को दीर्घकालिक भू-राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहा है — एक पहलू जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. राफेल बेनलेवी कौन हैं और उनका विश्लेषण क्यों महत्त्वपूर्ण है?
डॉ. राफेल बेनलेवी इजरायल के प्रतिष्ठित थिंक टैंक मिसगाव इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी के सीनियर फेलो हैं। वे मध्य पूर्व की सुरक्षा नीति और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विशेषज्ञता रखते हैं, इसलिए उनका दृष्टिकोण इजरायली रणनीतिक सोच को समझने में सहायक है।
इजरायल पाकिस्तान को ईरान संघर्ष में मध्यस्थ क्यों नहीं मानता?
डॉ. बेनलेवी के अनुसार, पाकिस्तान हमेशा इजरायल-विरोधी ताकतों के साथ खड़ा रहा है और वह ऐसे क्षेत्रीय समूहों के करीब है जो इजरायल के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख रखते हैं। इसलिए वह इस संघर्ष में एक पक्ष है, निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं।
क्या इजरायली हमलों से ईरान का परमाणु खतरा पूरी तरह समाप्त हो गया है?
नहीं। डॉ. बेनलेवी के अनुसार हमलों से ईरान की क्षमता को गंभीर नुकसान पहुँचा है, लेकिन उसके पास अब भी बैलिस्टिक मिसाइलें और भूमिगत ठिकानों में संवर्धित यूरेनियम मौजूद है। दीर्घकाल में खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति ईरान के संदर्भ में क्या है?
यह नीति ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य दबाव बनाए रखने पर आधारित है ताकि वह परमाणु हथियार विकसित न कर सके। डॉ. बेनलेवी के अनुसार ट्रंप प्रशासन ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा जिससे ईरान के लिए परमाणु हथियार बनाने का रास्ता खुला रहे।
ईरान-इजरायल संघर्ष में चीन की क्या भूमिका है?
चीन ईरान को तकनीक, कच्चा माल और आर्थिक सहयोग देता है और ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। हालाँकि डॉ. बेनलेवी के अनुसार, बड़े सैन्य संघर्ष की स्थिति में चीन सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगा और ईरान को उसके हाल पर छोड़ देगा।
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