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पाकिस्तान की ईरान-अमेरिका वार्ता में भूमिका: एक असली मध्यस्थ या केवल एक माध्यम?

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पाकिस्तान की ईरान-अमेरिका वार्ता में भूमिका: एक असली मध्यस्थ या केवल एक माध्यम?

सारांश

इस्लामाबाद में हुई ईरान-अमेरिका वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका पर एक नई रिपोर्ट ने सवाल उठाए हैं। क्या पाकिस्तान वास्तव में एक विश्वसनीय शांति मध्यस्थ है या यह केवल एक पब्लिक रिलेशन का प्रयास है? जानें इस महत्वपूर्ण विश्लेषण में।

मुख्य बातें

पाकिस्तान की भूमिका केवल एक अस्थायी संपर्क माध्यम के रूप में है।
आंतरिक समस्याएँ पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर रही हैं।
ईरान और अमेरिका का संघर्ष बड़े शक्ति संतुलन पर निर्भर करता है।
स्थायी शांति के लिए पाकिस्तान को कई चुनौतियों का सामना करना होगा।

स्टॉकहोम, १६ अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई बातचीत में पाकिस्तान ने एक प्रमुख शांति मध्यस्थ की भूमिका निभाई, लेकिन असल में यह भू-राजनीतिक वास्तविकता से अधिक एक पब्लिक रिलेशन संदेश था। ऐसा एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है।

इटली के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (आईएसपीआई) के प्रमुख जगन्नाथ पांडा ने स्टॉकहोम सेंटर फॉर साउथ एशियन एंड इंडो-पैसिफिक अफेयर्स (एससीएसए-आईपीए) में लिखा कि पाकिस्तान ने भले ही बातचीत को सुगम बनाने में मदद की हो, परंतु उसने इस प्रक्रिया के परिणाम को प्रभावित नहीं किया।

उन्होंने कहा, “इस्लामाबाद की असली चुनौती अब भी बनी हुई है: कोई भी देश तब तक स्थायी रूप से खुद को शांति का दावेदार नहीं बता सकता जब तक उसके अंदर आतंकवाद, सुरक्षा नीति में दोहरे मानक और निरंतर घरेलू अस्थिरता जैसे मुद्दे मौजूद हैं। जब तक ये बुनियादी समस्याएं हल नहीं होतीं, पाकिस्तान की कूटनीतिक सफलताएं इतिहास में अधिक नहीं दिखेंगी।”

पांडा ने बताया कि वास्तव में, ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच मौजूदा संघर्ष-विराम को अंततः 'हार्ड पावर' (सैन्य शक्ति) की गणनाओं, प्रतिरोध की सीमाओं, ऊर्जा से जुड़े जोखिमों और बड़ी शक्तियों के संदेशों ने ही आकार दिया है।

उन्होंने आगे कहा, “पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति ने रास्ते खोले, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वही इस सीजफायर का मुख्य निर्माता बन गया। असल में, बड़ी शक्तियां जहां भी संभव हो, संपर्क के रास्ते खोज रही थीं, और पाकिस्तान उनमें से केवल एक माध्यम था।”

पांडा ने इस पर भी जोर दिया कि पाकिस्तान के शांति मध्यस्थ बनने पर सवाल उठते हैं क्योंकि इसका आतंकवाद और शांति से जुड़ा भरोसा पुराना मुद्दा है।

उन्होंने लिखा, “कई दशकों से पाकिस्तान पर आरोप लगते रहे हैं कि वह रणनीतिक लाभ के लिए आतंकवादी समूहों को 'अच्छे' और 'बुरे' में बांटता है। भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ काम करने वाले आतंकी नेटवर्क ने पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को लगातार नुकसान पहुंचाया है। और जब खुद पाकिस्तान आतंकवाद से गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है, तब भी बाहरी देश उसके चयनात्मक रवैये को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुए।”

पांडा ने यह भी कहा कि पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते भी हमेशा स्थिर नहीं रहे हैं। सीमा तनाव, बलूच क्षेत्रों में उग्रवाद, सांप्रदायिक मुद्दे और क्षेत्रीय गठबंधनों की प्रतिस्पर्धा ने दोनों देशों के संबंधों को कई बार तनावपूर्ण बनाया है। इसलिए ईरान अपने मूल सुरक्षा हितों के मामले में केवल पाकिस्तान पर निर्भर नहीं रह सकता।

पांडा ने कहा कि इस पूरे सीजफायर मामले में पाकिस्तान की भूमिका को एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में नहीं, बल्कि एक अस्थायी और उपयोगी संपर्क माध्यम के रूप में समझा जाना चाहिए।

उन्होंने लिखा, “इस्लामाबाद इसलिए इस प्रक्रिया में शामिल हो सका क्योंकि उसके ईरान से संपर्क थे, खाड़ी देशों से कामचलाऊ रिश्ते थे, और अमेरिका व चीन दोनों के लिए उसकी कुछ अहमियत बनी हुई थी। लेकिन केवल एक ‘रास्ता’ होना, ‘मुख्य मध्यस्थ’ होने के बराबर नहीं है। असली मध्यस्थ वही होता है जिस पर भरोसा किया जा सके और जिसे तटस्थ माना जाए। पाकिस्तान इस मामले में केवल एक सुविधाजनक माध्यम था, न कि ऐसा पक्ष जिसने नतीजा निर्धारित किया हो।”

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह केवल एक संपर्क माध्यम है? यह स्पष्ट है कि इसके भीतर की समस्याओं के कारण इसकी अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित हो रही है।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पाकिस्तान की भूमिका वार्ता में क्या थी?
पाकिस्तान ने ईरान-अमेरिका वार्ता में एक संपर्क माध्यम के रूप में कार्य किया, हालांकि इसकी भूमिका को विश्वसनीय शांति मध्यस्थ के रूप में नहीं देखा जा सकता।
क्या पाकिस्तान अब शांति का गारंटर बन सकता है?
जब तक पाकिस्तान आतंकवाद, दोहरे मापदंड और घरेलू अस्थिरता जैसी समस्याओं का समाधान नहीं करता, तब तक इसे शांति का गारंटर नहीं माना जा सकता।
राष्ट्र प्रेस
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