अमेरिका-ईरान वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्थता पर सवाल, विशेषज्ञों का दावा — बीजिंग के हित सर्वोपरि
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान इन दिनों अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इस्लामाबाद की यह कूटनीतिक सक्रियता किसी तटस्थ नीति से नहीं, बल्कि चीन के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र के भीतर से संचालित हो रही है। इटली के भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुए कहा है कि पाकिस्तान की किसी भी मध्यस्थता का अंतिम लाभार्थी बीजिंग होगा, न कि क्षेत्रीय शांति।
मध्यस्थ की भूमिका, लेकिन किसके हित में?
टाइम्स ऑफ इजरायल के लिए लिखने वाले राजनीतिक सलाहकार और भू-राजनीतिक विश्लेषक सर्जियो रेस्टेली के अनुसार, इस्लामाबाद खुद को एक साथ कई भूमिकाओं में प्रस्तुत करना चाहता है — वाशिंगटन के लिए उपयोगी, तेहरान के लिए भरोसेमंद, खाड़ी देशों के लिए स्वीकार्य और व्यापक मुस्लिम दुनिया के सामने एक जिम्मेदार खिलाड़ी। हालाँकि, रेस्टेली का तर्क है कि यह बहुआयामी छवि असल में पाकिस्तान की स्वतंत्र कूटनीतिक क्षमता को नहीं, बल्कि चीन पर उसकी गहरी निर्भरता को उजागर करती है।
उन्होंने काराकोरम क्षेत्र और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की शक्सगाम घाटी का विशेष उल्लेख किया, जिसे पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया था। यह ऐतिहासिक संदर्भ, उनके अनुसार, पाकिस्तान की तथाकथित तटस्थता की सीमाओं को स्पष्ट करता है।
चीन-पाकिस्तान संबंध: भावनात्मक नारे, कड़वी हकीकत
रेस्टेली ने चीन और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगाँठ के मौके पर इस्लामाबाद की भाषा पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ‘हर मौसम का दोस्त’, ‘आयरन ब्रदरहुड’, ‘हिमालय से ऊँचा’ और ‘समुद्र से गहरा’ जैसी बातें सुनने में भावुक और लगभग काव्यात्मक लगती हैं, लेकिन इन नारों के पीछे एक कड़वी हकीकत छिपी है। पाकिस्तान की चीन के प्रति निष्ठा इसलिए मजबूत होती जा रही है क्योंकि उसका रणनीतिक अस्तित्व तेजी से बीजिंग पर निर्भर होता जा रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान अपनी आर्थिक और सैन्य जरूरतों के लिए चीन पर पहले से कहीं अधिक आश्रित है। गौरतलब है कि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के 2026 के आँकड़ों के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के हथियारों के आयात में 66 फीसदी की वृद्धि हुई, जिसमें चीन की हिस्सेदारी 80 फीसदी रही।
सैन्य निर्भरता: विविधीकरण नहीं, परावलंबन
रेस्टेली ने इस आँकड़े को विविधीकरण नहीं, बल्कि निर्भरता करार दिया। उनका कहना है कि जिस देश की सैन्य क्षमता — एयर डिफेंस, लड़ाकू विमान, नौसैनिक प्रणाली और रणनीतिक आत्मविश्वास — तेजी से एक ही सप्लायर पर आधारित हो जाए, वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसके भू-राजनीतिक फैसले पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
यह तर्क पाकिस्तान की मध्यस्थता की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है — विशेष रूप से तब, जब वह अमेरिका और ईरान जैसी परस्पर विरोधी शक्तियों के बीच संतुलन बनाने का दावा कर रहा हो।
बीजिंग की असली प्राथमिकताएँ
रेस्टेली के विश्लेषण के अनुसार, इस पूरे खेल में चीन की प्राथमिक चिंता न तो ईरान की जीत है, न पाकिस्तान की प्रतिष्ठा और न ही अमेरिका-विरोधी राजनीति। बीजिंग का असली उद्देश्य ऐसी क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना है जिससे उसकी ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रहे, अमेरिकी प्रभाव को संतुलित किया जा सके, तेहरान के साथ संबंध बने रहें और कोई भी क्षेत्रीय संघर्ष चीनी व्यापार व सप्लाई चेन को बाधित न करे।
रेस्टेली ने कहा, ‘पाकिस्तान की मध्यस्थता चीन को एक काम का जरिया देती है। इस्लामाबाद वहाँ बोल सकता है जहाँ बीजिंग ज्यादा खुलकर खड़ा नहीं होना चाहता। पाकिस्तान संदेश पहुँचा सकता है, प्रस्ताव परख सकता है, ईरान को भरोसा दिला सकता है, वाशिंगटन से जुड़ सकता है और खाड़ी देशों को संकेत दे सकता है — जबकि चीन पर्दे के पीछे बड़ी ताकत बना रहेगा।’
आगे क्या होगा
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की यह कूटनीतिक सक्रियता हिंद-प्रशांत और पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में उसके बढ़ते महत्व को दर्शाती है। लेकिन जब तक इस्लामाबाद चीन पर अपनी सैन्य और आर्थिक निर्भरता को कम नहीं करता, उसकी मध्यस्थता की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता दोनों पर प्रश्नचिह्न बना रहेगा। आने वाले महीनों में अमेरिका-ईरान वार्ता की दिशा यह तय करेगी कि पाकिस्तान की यह भूमिका वास्तविक कूटनीतिक सफलता में बदलती है या महज बीजिंग के हितों की पूर्ति का माध्यम बनकर रह जाती है।