न्यायपालिका में एआई: जस्टिस मनमोहन बोले — कानूनी जवाबदेही और इंसानी निगरानी अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस मनमोहन ने 19 मई 2025 को नई दिल्ली स्थित ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में स्पष्ट किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के न्यायिक उपयोग के लिए संस्थागत निगरानी और कानून के तहत जवाबदेही अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि एआई का विस्तार चाहे जितना हो, मानवीय निर्णय-प्रक्रिया को हमेशा केंद्र में रखा जाना चाहिए। यह वक्तव्य डॉ. एच.आर. भारद्वाज मेमोरियल लेक्चर के दौरान दिया गया, जिसका विषय था — 'न्याय वितरण और कानूनी व्यवस्था पर एआई का प्रभाव'।
जस्टिस मनमोहन का मुख्य वक्तव्य
जस्टिस मनमोहन ने कहा, 'जरूरत इस बात की है कि एआई के इस्तेमाल के बावजूद मानवीय निर्णय को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।' उन्होंने रेखांकित किया कि भारत को न्यायिक एआई के लिए एक स्पष्ट रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की आवश्यकता है, जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हो। उनके अनुसार, न्यायपालिका में क्षमता निर्माण के साथ-साथ विश्वविद्यालयों को एआई के नैतिक, संवैधानिक और प्रक्रियागत पहलुओं पर पाठ्यक्रम विकसित करने होंगे।
उन्होंने एआई की तकनीकी परिभाषा भी स्पष्ट की — यदि कोई सिस्टम पूर्व-निर्धारित नियमों पर चलता है तो वह एआई नहीं है, लेकिन जब कोई सिस्टम डेटा के आधार पर स्वयं नए नियम सीखता है, तभी वह वास्तविक एआई सिस्टम कहलाता है।
सुप्रीम कोर्ट की एआई समिति और व्हाइट पेपर
जस्टिस मनमोहन ने बताया कि एआई के बढ़ते महत्व को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक एआई कमेटी का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता एक मौजूदा न्यायाधीश कर रहे हैं। यह समिति एआई के उपयोग के लिए रणनीति और सुरक्षा मानकों पर कार्यरत है।
उन्होंने नवंबर 2025 में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड प्लानिंग द्वारा जारी सुप्रीम कोर्ट के 'व्हाइट पेपर ऑन एआई एंड ज्यूडिशियरी' का उल्लेख किया। इस दस्तावेज़ में एआई को एक सहायक तकनीक बताया गया है, जो कानूनी शोध, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद, फाइलिंग और प्रशासनिक कार्यों में सहायता कर सकती है — परंतु अंतिम निर्णय सदैव न्यायाधीश का ही होगा और प्रत्येक एआई आउटपुट की मानवीय समीक्षा अनिवार्य होगी।
यह ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर की न्यायिक प्रणालियाँ एआई के एकीकरण को लेकर नीतिगत ढाँचे बना रही हैं। गौरतलब है कि जब देश के मूल कानून बनाए गए थे, तब दुनिया पूर्णतः भौतिक थी — अब डिजिटल युग में यह विचार करना आवश्यक है कि पुराने कानूनों को उसी रूप में लागू किया जाए या नई परिस्थितियों के अनुसार नए सिद्धांत विकसित किए जाएँ।
डेटा प्राइवेसी पर चिंता
जस्टिस मनमोहन ने डेटा गोपनीयता को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अनेक बार नागरिक यह नहीं समझ पाते कि उनके व्यक्तिगत डेटा के आधार पर कौन-से निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं और भविष्य में उनका क्या प्रभाव पड़ सकता है। यह न्यायिक एआई के संदर्भ में विशेष रूप से संवेदनशील प्रश्न है।
डॉ. एच.आर. भारद्वाज को श्रद्धांजलि
जस्टिस मनमोहन ने डॉ. हंस राज भारद्वाज (17 मई 1937 – 8 मार्च 2020) को बहुआयामी व्यक्तित्व बताया — लेखक, वरिष्ठ अधिवक्ता, पाँच बार राज्यसभा सांसद (1982–2009) और तीन प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में 15 वर्षों तक मंत्री। वह कर्नाटक और केरल के पूर्व राज्यपाल (2012–13) तथा पूर्व केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री (2004–2009) भी रहे।
उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में लागू ई-मोड कार्यक्रम का पहला चरण उसी दौर में शुरू हुआ था जब डॉ. भारद्वाज कानून मंत्री थे। डॉ. भारद्वाज ने वैकल्पिक विवाद समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (आईसीएडीआर) की स्थापना, महिलाओं के संपत्ति अधिकार, ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना और विधायिकाओं में महिला आरक्षण जैसे सुधारों में अहम भूमिका निभाई।
विश्वविद्यालय और परिवार की भागीदारी
ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) सी. राज कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय की स्थापना की परिकल्पना को डॉ. भारद्वाज का समर्थन प्राप्त था। उन्होंने कहा, 'डॉ. भारद्वाज मानते थे कि भारत को ऐसा वैश्विक विश्वविद्यालय चाहिए जो भारतीय मूल्यों पर आधारित हो लेकिन वैश्विक सोच रखता हो।' वर्तमान में विश्वविद्यालय में 16,000 से अधिक छात्र और 4,000 संकाय सदस्य व कर्मचारी हैं।
अधिवक्ता कर्ण भारद्वाज ने अपने दादा को याद करते हुए कहा कि न्यायालयों का डिजिटलीकरण और एआई का उपयोग विधि पेशे को तेज़ी से बदल रहा है और नई पीढ़ी के वकील प्रौद्योगिकी-प्रेरित मानसिकता के साथ इस क्षेत्र में आ रहे हैं। कार्यक्रम में डॉ. भारद्वाज की पत्नी डॉ. प्रफुल्लता भारद्वाज, पुत्र अरुण भारद्वाज (वरिष्ठ अधिवक्ता) तथा पौत्र कर्ण भारद्वाज और गौतम भारद्वाज (दोनों अधिवक्ता) उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर दबिरु श्रीधर पटनायक के संबोधन से हुआ।
न्यायपालिका और प्रौद्योगिकी के इस संगम पर जस्टिस मनमोहन की यह चेतावनी — कि एआई सहायक है, निर्णायक नहीं — आने वाले वर्षों में भारत के न्यायिक एआई नीति-निर्माण की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।