काशी में ‘बुढ़वा मंगल’ का जश्न: होली के बाद का अनोखा उत्सव
सारांश
Key Takeaways
- बुढ़वा मंगल होली के बाद का एक महत्वपूर्ण त्योहार है।
- यह बुजुर्गों के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
- गंगा के घाट पर संगीत और नृत्य का आयोजन होता है।
- देश-विदेश से सैलानी इस उत्सव का आनंद लेने आते हैं।
- यह काशी की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को दर्शाता है।
वाराणसी, 10 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जब होली की रंग-बिरंगी खुशबू पूरे देश में बिखर जाती है, तब शिवनगरी काशी में एक नया उत्सव ‘बुढ़वा मंगल’ की शुरुआत होती है। यह त्योहार, जो होली के बाद पहले मंगलवार को मनाया जाता है, बनारस की प्राचीन परंपरा को दर्शाता है। यह केवल होली का समापन नहीं है, बल्कि प्रेम, सौहार्द, संगीत और बुजुर्गों के प्रति सम्मान का एक अद्वितीय उत्सव है, जिसमें गंगा के घाट पर रंग, गीत और खुशियाँ बिखर जाती हैं।
‘बुढ़वा मंगल’ का नाम अपने आप में काशी की संस्कृति का प्रतीक है। यह दिन बुजुर्गों को समर्पित है, जहाँ लोग देवी-देवताओं के साथ-साथ अपने परिवार और मोहल्ले के वृद्धजनों को अबीर-अबीर अर्पित करते हैं। होली के दिन की मस्ती और उल्लास यहाँ शांति, आशीर्वाद और सम्मान में परिवर्तित हो जाता है। स्थानीय लोग इस दिन नए कपड़े पहनकर घाटों पर पहुँचते हैं, ठंडई और बनारसी मिठाइयों का आनंद लेते हैं और होली के उत्सव में शामिल होते हैं।
काशी के निवासी प्रभुनाथ त्रिपाठी ने इस परंपरा के बारे में कहा, “होली के बाद बनारसियों पर एक विशेष खुमारी बनी रहती है। मंगलवार को ‘बुढ़वा मंगल’ के साथ इस मस्ती का समापन होता है। यह वर्षों पुरानी रीत है, जिसे बनारस आज भी पूरी मेहनत से निभाता है। इस दिन के बाद गुलाल-अबीर अगले साल होली तक के लिए रोक दिए जाते हैं। बुढ़वा मंगल केवल संगीत का उत्सव नहीं है, बल्कि खान-पान, गुलाल और पहनावे का भी जश्न है।”
बुढ़वा मंगल का मुख्य आकर्षण गंगा के घाट होते हैं। दशाश्वमेध घाट से अस्सी घाट तक सजी हुई बजड़ों (नावों) में लोकगायक और कलाकार अपनी प्रस्तुतियाँ देते हैं। इन बजड़ों को फूलों से सजाया जाता है, और ये गद्दों और मसनद के साथ इत्र की खुशबू में महकते हैं। शाम को ये बजड़े संगीत की महफिल में तब्दील हो जाते हैं, जहाँ बनारस घराने की होरी, चैती, ठुमरी, बिरहा और कजरी की मधुर धुनें गूंजती हैं।
एक समय था जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई, गिरिजा देवी की चैती, पंडित किशन महाराज का तबला और सितार की झंकार रातभर गूंजती थी। आज भी स्थानीय और आसपास के जिलों के लोकगायक इन घाटों पर माँ गंगा और हनुमान जी के चरणों में अपनी कला प्रस्तुत करते हैं। यह महफिल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भक्ति और अनोखी परंपरा का संगम है।
मंगलवार को बनारस के कई घाटों पर इस परंपरा का निर्वहन होता है। दशाश्वमेध घाट से अस्सी घाट तक बुढ़वा मंगल की खुमारी में लोग डूबते-उतराते नजर आते हैं। गंगा नदी में खड़े बजड़े में लोकगायक अपनी प्रस्तुतियाँ देते हैं। इसमें बनारस और आसपास के जिलों के कई लोकगायक और कलाकार शामिल होते हैं। बनारसी घराने की होरी, चैती, ठुमरी से शाम सुरीली हो जाती है। बुढ़वा मंगल काशी का एक अनोखा रंग है, जहाँ परंपरा बनारस के अक्खड़पन, फक्कड़पन और आध्यात्मिकता को समेटे हुए दिखती है।
इस दिन देश-विदेश से सैलानी भी काशी पहुँचते हैं। वे गंगा तट पर बिखरे रंग, संगीत और बनारसी जोश का आनंद लेते हैं। घरों में पकवान बनते हैं, दोस्तों-रिश्तेदारों से आखिरी होली मिलन होता है और परिवार के बुजुर्गों को सम्मान दिया जाता है।