काशी की गुलाबी मीनाकारी को जीआई टैग के बाद वैश्विक पहचान, 8 देशों से मिल रहे ऑर्डर
सारांश
मुख्य बातें
वाराणसी की सदियों पुरानी गुलाबी मीनाकारी कला को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में नई उड़ान मिली है। काशी के कारीगरों को अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, इटली, इज़राइल, कनाडा और दुबई सहित आठ से अधिक देशों से नियमित रूप से ज्वेलरी ऑर्डर प्राप्त हो रहे हैं। इस वैश्विक माँग ने स्थानीय शिल्पकारों के लिए रोज़गार और आय के नए द्वार खोले हैं।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
गुलाबी मीनाकारी अपनी बारीक हस्तकला और विशिष्ट रंग-संयोजन के लिए विश्वभर में जानी जाती है। विदेशी ग्राहक अपनी पसंद और समकालीन ट्रेंड के अनुसार डिज़ाइन भेजते हैं, जिन्हें वाराणसी के शिल्पकार पारंपरिक तकनीक में ढालकर आधुनिक आभूषणों का रूप देते हैं। हाथ से की गई उत्कृष्ट कारीगरी और उच्च गुणवत्ता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इन उत्पादों की माँग लगातार बढ़ती जा रही है।
पाँच पीढ़ियों की विरासत
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित गुलाबी मीनाकारी कलाकार रमेश कुमार विश्वकर्मा ने बताया कि उनका परिवार वर्ष 1982 से इस कला से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा, "आज हमारे परिवार की पाँचवीं पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है और युवा पीढ़ी इस परंपरागत शिल्प को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में जुटी है।" यह ऐसे समय में उल्लेखनीय है जब देश के कई पारंपरिक शिल्पों में युवाओं की रुचि घटती देखी जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय मंच
विश्वकर्मा के अनुसार, काशी की गुलाबी मीनाकारी को वैश्विक पहचान दिलाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रधानमंत्री ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस कला से बने उपहार विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और विशिष्ट अतिथियों को भेंट किए। विश्वकर्मा ने बताया कि अमेरिका की पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को भी उनके द्वारा तैयार किया गया गिफ्ट सेट भेंट किया गया था। इसके अलावा दुबई एक्सपो जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भी उनके बनाए आभूषण प्रदर्शित किए गए, जिससे इस शिल्प की वैश्विक पहचान और मज़बूत हुई।
ओडीओपी योजना का योगदान
विश्वकर्मा ने उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक जिला, एक उत्पाद' (ओडीओपी) योजना को भी इस सफलता में अहम बताया। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस योजना के तहत मिले प्रोत्साहन से कारीगरों को नए बाज़ार मिले हैं और कारोबार में लगातार वृद्धि हो रही है। गौरतलब है कि ओडीओपी के तहत वाराणसी के लिए गुलाबी मीनाकारी को प्राथमिक उत्पाद के रूप में चुना गया है।
कारीगरों की आजीविका पर असर
विदेशी बाज़ार से बढ़ती माँग ने न केवल इस पारंपरिक कला को नई पहचान दी है, बल्कि वाराणसी के स्थानीय कारीगरों की आजीविका को भी सुदृढ़ किया है। काशी की सांस्कृतिक विरासत अब विश्व स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। आने वाले समय में जीआई टैग और सरकारी योजनाओं के समन्वय से इस शिल्प के और अधिक विस्तार की संभावनाएँ हैं।