'वोकल फॉर लोकल' का असर: कश्मीरी पश्मीना शॉल अब विदेशों में भी पहचान बना रही है
सारांश
Key Takeaways
- 'वोकल फॉर लोकल' मुहिम ने बुनकरों के जीवन में सुधार किया है।
- पश्मीना शॉल की अंतरराष्ट्रीय मांग में वृद्धि हुई है।
- बुनकर अब उद्यमी बन रहे हैं।
- पारंपरिक कला को संरक्षित करने का प्रयास जारी है।
- सरकारी योजनाओं से रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं।
जम्मू, 16 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'वोकल फॉर लोकल' पहल ने जम्मू के कश्मीरी पश्मीना शॉल के बुनकरों के जीवन में बड़ा परिवर्तन लाया है। बुनकरों का मानना है कि जब से पीएम मोदी ने देशवासियों को स्थानीय उत्पादों को खरीदने के लिए प्रेरित किया है, तब से लोगों की रुचि में वृद्धि हुई है।
केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं और पारंपरिक उद्योगों को प्रोत्साहन देने की नीतियों के कारण जम्मू क्षेत्र के कला और हस्तशिल्प से जुड़े कारीगरों को नए अवसर मिल रहे हैं। स्थानीय कलाकार और बुनकर अपने पारंपरिक कौशल को आधुनिक बाजार से जोड़कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दीवार चित्रकला, खादी आधारित कपास और पश्मीना बुनाई जैसे पारंपरिक काम नए रूप में उभर रहे हैं।
पश्मीना बुनाई जम्मू-कश्मीर की एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक हस्तशिल्प परंपरा है, जिसे कई परिवार पीढ़ियों से बनाए रखे हुए हैं। यह बेहद महीन ऊन से बनाई जाती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी मांग बहुत अधिक है। स्थानीय बुनकर इस पारंपरिक कला को जीवित रखते हुए आज उद्यमी बन रहे हैं और अपने उत्पादों को बड़े बाजारों में पहुंचा रहे हैं।
बुनकर राजिंदर कुमार ने बताया कि वे पश्मीना शॉल का निर्माण करते हैं। इसमें 10 लोग मिलकर काम करते हैं। हमें बहुत खुशी होती है जब पीएम कभी-कभी अपने भाषण में पश्मीना शॉल का उल्लेख करते हैं। अब हमारा पश्मीना शॉल केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध हो रहा है। उन्होंने कहा कि पहले मार्केटिंग में समस्या थी, लेकिन पीएम मोदी की अपील ने इसे आसान बना दिया है। व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से भी सहायता मिल रही है।
जम्मू क्षेत्र में दीवार चित्रकला एक प्राचीन कला परंपरा है, जो मंदिरों, पुराने महलों और हवेलियों की दीवारों पर देखी जाती है। इन चित्रों में धार्मिक कथाएं, स्थानीय लोककथाएं और सामान्य जनजीवन के दृश्य दर्शाए जाते हैं। आज यह पारंपरिक कला नए कलाकारों और शोधकर्ताओं के माध्यम से पुनर्जीवित हो रही है। फाइन आर्ट्स और म्यूजियोलॉजी के क्षेत्र में काम करने वाले युवा कलाकार इस कला को संरक्षित करने के साथ-साथ इसे आधुनिक मंच भी दे रहे हैं।
कलाकार बिराजा बारिक ने कहा कि पीएम मोदी की 'वोकल फॉर लोकल' मुहिम के बाद से लोग जागरूक हुए हैं और वॉल पेंटिंग के प्रति रुचि बढ़ी है।
जम्मू क्षेत्र में खादी और हैंडलूम उद्योग भी पारंपरिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। यहां हाथ से काता और बुना गया कपास पर्यावरण के अनुकूल है और स्थानीय कारीगरों की आजीविका का एक मुख्य स्रोत है। खादी और हैंडलूम विभाग की पहलों के कारण कारीगरों को प्रशिक्षण, उपकरण और बाजार तक पहुंच मिल रही है, जिससे यह पारंपरिक उद्योग नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहा है।
कारीगरों का कहना है कि सरकारी प्रोत्साहन और योजनाओं के माध्यम से उन्हें अपने काम को आगे बढ़ाने का मौका मिला है। इससे न केवल पारंपरिक कला और शिल्प का संरक्षण हो रहा है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं।