केरल पीएससी भर्ती घोटाला: जांच अब इंटरनल विजिलेंस एसपी को, चेयरमैन बैजू का फैसला पलटा
सारांश
मुख्य बातें
केरल लोक सेवा आयोग (पीएससी) ने सोमवार, 6 जुलाई को राज्य योजना बोर्ड में नियुक्तियों से जुड़े कथित भर्ती घोटाले की जांच को लेकर अपना विवादित निर्णय वापस ले लिया। पहले यह जांच परीक्षा नियंत्रक को सौंपी गई थी, लेकिन आयोग के भीतर तीखे विरोध के बाद अब यह जिम्मेदारी आंतरिक सतर्कता (इंटरनल विजिलेंस) विंग के पुलिस अधीक्षक को दे दी गई है।
मुख्य घटनाक्रम
यह बदलाव तब हुआ जब पीएससी के कई सदस्यों ने चेयरमैन डॉ. एम.आर. बैजू के फैसले पर खुलकर सवाल उठाए। सदस्यों का कहना था कि आयोग ने शुरू में जांच इंटरनल विजिलेंस विंग को सौंपने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन बाद में इसे परीक्षा नियंत्रक को दे दिया गया — एक कदम जिसे आलोचकों ने जांच को कमजोर करने की कोशिश बताया। बोर्ड की बैठक में टकराव की स्थिति पैदा हो गई, जहाँ खबरों के अनुसार चेयरमैन पर सदस्यों के एक समूह की ओर से भारी दबाव डाला गया।
विवाद की जड़: परीक्षा में 10 सवालों की अनदेखी
प्लानिंग बोर्ड में भर्ती से जुड़ा यह विवाद तीन विभागों में चीफ-लेवल के पदों के लिए आयोजित एक सामान्य परीक्षा पर केंद्रित है। आरोप है कि मूल्यांकन के दौरान दस सवालों की जांच नहीं की गई। इसके बावजूद दो पदों के लिए रैंक लिस्ट जारी की गई और नियुक्तियाँ की गईं — जिनमें एक वामपंथी संगठन से जुड़े उस उम्मीदवार की नियुक्ति भी शामिल थी जिसने पहली रैंक हासिल की थी।
पीएससी ने बाद में स्वीकार किया कि मूल्यांकन में गलती हुई और विवाद सामने आने के बाद एक रैंक लिस्ट रद्द कर दी। हालाँकि आयोग ने अब तक उत्तर पुस्तिकाओं का दोबारा मूल्यांकन शुरू नहीं किया है और न ही रैंकिंग में कोई बदलाव किया है।
सरकार पर बढ़ता दबाव
इस घटनाक्रम ने राजनीतिक हलचल को काफी बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन को कथित तौर पर पिछले दशक में पीएससी के कामकाज को लेकर कई शिकायतें मिली हैं — विशेष रूप से पिनाराई विजयन सरकार के कार्यकाल के दौरान की। अब सतीशन सरकार पर विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो (VACB) से पूरी जांच कराने का दबाव बढ़ रहा है। यह विवाद बुधवार की कैबिनेट बैठक को और भी महत्वपूर्ण बना देता है।
आयोग की संरचना पर सवाल
इस घटना ने पीएससी के गठन को लेकर जांच-पड़ताल को भी फिर से हवा दे दी है। मौजूदा नियमों के तहत चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति सरकार करती है और वे 62 वर्ष की आयु तक या छह वर्ष तक — जो भी पहले हो — पद पर बने रहते हैं। मौजूदा आयोग, जिसमें अध्यक्ष और 15 सदस्य शामिल हैं, पिछली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार के दौरान नियुक्त किया गया था।
आगे क्या होगा
फिलहाल आयोग में पाँच पद रिक्त हैं और सतीशन सरकार नई नियुक्तियों के विकल्पों पर विचार कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन फैसलों से इस संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता और भविष्य के कामकाज, दोनों पर गहरा असर पड़ेगा। स्वतंत्र जांच की माँग तेज होती जा रही है और यह मामला केरल की राजनीति में एक बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है।