किसान आंदोलन को कमज़ोर कर रहे हैं कुछ नेता, सुखजीत सिंह बोले — 'ईगो और घमंड छोड़ो, वरना हल नहीं निकलेगा'
सारांश
मुख्य बातें
किसान नेता सुखजीत सिंह ने 20 अगस्त को बाटला में कुछ वरिष्ठ किसान नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए — उनके अनुसार ये नेता निजी फायदे के लिए आंदोलन का इस्तेमाल कर रहे हैं, आपसी झगड़े बढ़ा रहे हैं और इस तरह किसान संघर्ष की धार को कुंद कर रहे हैं। उन्होंने संगठनों के कैडर से सीधे अपील की कि ऐसे नेताओं को पदों से हटाकर किसानों के असली हितों की रक्षा करने वाले सक्षम लोगों को आगे लाया जाए।
मुख्य आरोप और बयान
सुखजीत सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'जब तक ये नेता ईगो और घमंड के साथ संगठन की कमान संभाले रहेंगे, किसानों की समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकलेगा। वे लोगों के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए लड़ रहे हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि एक बड़े किसान संगठन के वरिष्ठ नेता ने दूसरे नेता पर कोड ऑफ कंडक्ट तोड़ने का आरोप लगाया, जबकि दूसरे नेता ने वही आरोप पहले पर वापस लगाया — यह आपसी कीचड़उछाल किसान आंदोलन को नुकसान पहुँचा रही है।
दिल्ली आंदोलन से सबक
सुखजीत सिंह ने पिछले दिल्ली किसान आंदोलन का हवाला देते हुए कहा कि उस दौरान भी कुछ लोगों ने गलतियाँ कीं, लेकिन देशभर के किसानों की एकजुट भागीदारी ने उन गलतियों पर लगाम लगाई और सरकार पर दबाव बनाकर तीन कृषि कानूनों को रद्द करवाया। उनके अनुसार, वही सामूहिक शक्ति आज भी ज़रूरी है — लेकिन अहंकारी नेतृत्व उसे खंडित कर रहा है।
किसान और मज़दूरों पर असर
सुखजीत सिंह ने चेतावनी दी कि नेताओं की 'मैं बड़ा हूँ' वाली प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा नुकसान किसानों और मज़दूरों को हो रहा है, जिनके हक के लिए इन संगठनों को असल में लड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो नेता सिर्फ अपनी जेब भरना चाहते हैं या संगठन का उपयोग खुद को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करने के लिए करते हैं, वे किसान हित के दुश्मन हैं।
जवाबदेही की माँग
किसान नेता ने एक महत्त्वपूर्ण माँग रखी — जनता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह किसान संगठनों के नेताओं को उसी तरह हटा सके जैसे राजनीतिक दलों को चुनाव में हराया जाता है। उन्होंने खुद को भी इससे अलग नहीं रखा और कहा, 'अगर मैं कोई गलती करता हूँ, तो मुझे हटाओ और मुझसे बेहतर किसी को नियुक्त करो।' यह बयान किसान आंदोलन में आंतरिक लोकतंत्र की बहस को नई दिशा दे सकता है।
आगे क्या
सुखजीत सिंह की यह खुली आलोचना किसान संगठनों के भीतर बढ़ते असंतोष का संकेत है। आलोचकों का कहना है कि यदि नेतृत्व में पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं आई, तो आने वाले किसी भी आंदोलन को वह जन-समर्थन नहीं मिलेगा जो दिल्ली आंदोलन को मिला था। किसान संगठनों की प्रतिक्रिया और आंतरिक सुधार की दिशा पर अब सबकी नज़र होगी।