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किसान आंदोलन में अहंकार और नेतृत्व की होड़ से एकता टूट रही है: सुखजीत सिंह

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किसान आंदोलन में अहंकार और नेतृत्व की होड़ से एकता टूट रही है: सुखजीत सिंह

सारांश

किसान नेता सुखजीत सिंह ने माना — नेतृत्व की होड़ और अहंकार ने किसान आंदोलन को अंदर से कमजोर किया है। शंभू-खनौरी में सरकार 6-7 माँगें मानने को तैयार थी, लेकिन नेताओं की महत्वाकांक्षा ने वह मौका गँवा दिया। यह आत्मस्वीकृति किसान राजनीति के लिए एक दुर्लभ और असुविधाजनक आईना है।

मुख्य बातें

सुखजीत सिंह ने 20 अगस्त को बटाला में कहा कि किसान संगठनों में नेतृत्व की होड़ और अहंकार से आंदोलन की एकता टूट रही है।
शंभू-खनौरी आंदोलन में सरकार ने 13 में से 6-7 माँगें मौखिक रूप से मानने का संकेत दिया था, लेकिन नेताओं के अहंकार के कारण यह अवसर चूक गया।
सुखजीत सिंह ने खुद स्वीकार किया कि वे भी इस समस्या का हिस्सा रहे हैं।
पटियाला मोर्चे में 10 दिन के व्रत और संघर्ष के बाद सरकार ने 7 माँगें मानी थीं — इसे उन्होंने सफल आंदोलन का उदाहरण बताया।
उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपील की कि गलत नेतृत्व को हटाकर बेहतर व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जाए।
उनके अनुसार, किसान आंदोलन की कमजोरी का असर केवल वर्तमान पीढ़ी पर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।

किसान नेता सुखजीत सिंह ने 20 अगस्त को बटाला में एक विशेष बातचीत में किसान संगठनों के भीतर जारी आंतरिक कलह पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि नेतृत्व की होड़ और व्यक्तिगत अहंकार के कारण किसान आंदोलन की एकता को गंभीर नुकसान पहुँच रहा है। उनके अनुसार, इस आंतरिक खींचतान का सबसे बड़ा खामियाजा किसानों और खेतिहर मजदूरों को भुगतना पड़ रहा है।

मुख्य आरोप और स्वीकारोक्ति

सुखजीत सिंह ने कुछ वरिष्ठ किसान नेताओं पर निजी हितों को प्राथमिकता देने और आपसी विवादों को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने का आरोप लगाया। उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने खुद को भी इस समस्या से अलग नहीं रखा — उन्होंने स्वीकार किया कि वे भी किसी न किसी हद तक इस समस्या का हिस्सा रहे हैं। उनके अनुसार, किसान संगठनों के भीतर कई बार राजनीतिक दलों से भी अधिक राजनीति देखने को मिलती है।

दिल्ली आंदोलन से तुलना

सुखजीत सिंह ने दिल्ली किसान आंदोलन का संदर्भ देते हुए कहा कि उस आंदोलन में भी नेताओं से गलतियाँ हुई थीं, लेकिन देशव्यापी जन-भागीदारी के कारण आंदोलन सफल रहा और सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। हालाँकि, उन्होंने खेद जताया कि उस अनुभव से सबक नहीं लिया गया और वही गलतियाँ बाद में भी दोहराई गईं। यह गौरतलब है कि दिल्ली आंदोलन में सुखजीत सिंह एक पर्यवेक्षक की भूमिका में थे, न कि सीधे भागीदार।

शंभू-खनौरी आंदोलन में चूका अवसर

शंभू-खनौरी आंदोलन का जिक्र करते हुए सुखजीत सिंह ने कहा कि वे इस आंदोलन में सीधे तौर पर शामिल थे और लगभग हर महत्वपूर्ण बैठक में उपस्थित रहे। उनके अनुसार, किसान संगठन 13 माँगों को लेकर आंदोलन पर उतरे थे और बातचीत के दौरान सरकार ने मौखिक रूप से इनमें से करीब 6-7 माँगें मानने का संकेत दिया था। उस समय सरकार पर राजनीतिक और चुनावी दबाव भी था, जिससे किसानों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल करने का अवसर बना था। लेकिन उनके अनुसार, कुछ नेताओं के अहंकार और खुद को बड़ा साबित करने की कोशिश के कारण यह अवसर हाथ से निकल गया।

किसान संगठनों की बढ़ती संख्या पर सवाल

सुखजीत सिंह ने किसान जत्थेबंदियों की बढ़ती संख्या पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज लगभग हर संगठन का अपना प्रधान और अपना प्रभाव क्षेत्र है, लेकिन जब सभी को एक साझा मंच पर लाने की बात आती है तो एकता मुश्किल हो जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी आंदोलन की सफलता केवल संख्या से नहीं, बल्कि समझ, रणनीति और सामूहिक प्रयास से तय होती है।

नेताओं से जवाबदेही की माँग

सुखजीत सिंह ने किसान संगठनों के कार्यकर्ताओं और आम किसानों से अपील की कि यदि उनका नेतृत्व गलत दिशा में जा रहा है तो उन्हें अपने नेताओं से सवाल करना चाहिए। उन्होंने पटियाला मोर्चे का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ नेताओं ने करीब 10 दिन तक व्रत किया और संघर्ष के बाद सरकार ने सात माँगें मान लीं — यही किसी आंदोलन की वास्तविक सफलता है। उन्होंने कहा कि नेता की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि इस बात से होनी चाहिए कि उसने किसानों के लिए वास्तव में क्या हासिल किया। उन्होंने यह भी कहा कि किसान आंदोलन तभी मजबूत होगा जब अलग-अलग संगठन अपने-अपने हितों से ऊपर उठकर एक साझा मंच पर आएँ और लक्ष्य किसी एक नेता को बड़ा बनाना नहीं, बल्कि किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए ठोस उपलब्धियाँ हासिल करना हो।

संपादकीय दृष्टिकोण

या सिर्फ एक और बयान? शंभू-खनौरी में 6-7 माँगें मनवाने का जो अवसर गँवाया गया, वह किसानों के लिए एक ठोस नीतिगत नुकसान था — जिसकी कीमत नेताओं ने नहीं, खेतों में काम करने वाले किसानों ने चुकाई। किसान आंदोलनों की बार-बार की विफलता यह दर्शाती है कि समस्या केवल व्यक्तित्व की नहीं, बल्कि जवाबदेही के ढाँचे की अनुपस्थिति की है — जब तक संगठनों में चुनाव-आधारित नेतृत्व और पारदर्शी उपलब्धि-रिपोर्टिंग नहीं होगी, अहंकार की यह लड़ाई जारी रहेगी।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुखजीत सिंह ने किसान संगठनों पर क्या आरोप लगाए?
सुखजीत सिंह ने कहा कि कुछ वरिष्ठ किसान नेता निजी हितों को प्राथमिकता देते हैं, आपसी विवादों को लंबा खींचते हैं और नेतृत्व की होड़ में किसान आंदोलन को कमजोर करते हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वे खुद भी इस समस्या से अछूते नहीं रहे हैं।
शंभू-खनौरी आंदोलन में किसानों का अवसर क्यों चूका?
सुखजीत सिंह के अनुसार, उस आंदोलन में सरकार ने 13 में से करीब 6-7 माँगें मौखिक रूप से मानने का संकेत दिया था। लेकिन कुछ नेताओं के अहंकार और खुद को बड़ा साबित करने की कोशिश के कारण किसान संगठनों के हाथ से यह महत्वपूर्ण अवसर निकल गया।
दिल्ली किसान आंदोलन की सफलता का क्या कारण था?
सुखजीत सिंह के अनुसार, दिल्ली आंदोलन में नेताओं से गलतियाँ हुईं, लेकिन पूरे देश की व्यापक जन-भागीदारी के कारण सरकार पर दबाव बना और तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। जनता की मजबूत भागीदारी ने गलत फैसले लेने वाले नेताओं पर भी अंकुश लगाया।
किसान संगठनों में एकता क्यों नहीं बन पाती?
सुखजीत सिंह के अनुसार, लगभग हर किसान नेता सबसे बड़ा नेता बनना चाहता है और पूरे देश का नेतृत्व अपने हाथ में चाहता है। जब भी एकता की कोशिश होती है, नेतृत्व और संगठनात्मक वर्चस्व का सवाल उठते ही विवाद फिर खड़े हो जाते हैं।
सुखजीत सिंह ने किसान कार्यकर्ताओं को क्या सलाह दी?
उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपील की कि यदि संगठनात्मक नेतृत्व गलत दिशा में जा रहा है तो नेताओं से सवाल करें और जरूरत पड़े तो गलत नेतृत्व को हटाकर बेहतर व्यक्ति को जिम्मेदारी दें। उन्होंने अपनी खुद की जत्थेबंदी के कैडर से भी यही अपेक्षा जताई।
राष्ट्र प्रेस
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