क्या हरिवंश राय बच्चन ने शराब चखी नहीं, नशा शब्दों का था, जब ‘मधुशाला’ पर उठा सवाल और गांधी बने साक्षी?
सारांश
Key Takeaways
- हरिवंश राय बच्चन ने शराब का सेवन नहीं किया फिर भी 'मधुशाला' लिखी।
- उनकी कविताओं में भावुकता और जीवन का दर्शन है।
- महात्मा गांधी ने उनके लेखन का समर्थन किया।
- बच्चन की सरल भाषा ने साहित्य में नई पहचान दिलाई।
- उन्होंने साहित्य के लिए कई पुरस्कार जीते।
नई दिल्ली, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। "मैं एक जगत को भूला, मैं भूला एक जमाना, कितने घटना-चक्रों में भूला मैं आना-जाना।" हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के महान कवि और लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनकी रचनाएं अद्भुत हैं और सामान्य जनमानस को सरलता से प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं में भावुकता, रस और आनंद का अद्भुत समावेश होता है।
"जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला, कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं, जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।"
27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद (प्रयागराज) में जन्मे हरिवंश राय बच्चन ने मानव चेतना जागृति के लिए प्रेरणादायक कविताएं लिखीं। उनकी कालजयी रचना 'मधुशाला' आज भी गुनगुनाई जाती है।
"अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला, अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला। फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया- अब न रहे वे पीने वाले, अब न रही वह मधुशाला।"
हरिवंश राय बच्चन ने कभी भी मदिरा का सेवन नहीं किया, लेकिन उन्होंने उस अनुभव को अपनी लेखनी में इस तरह उकेरा कि 'मधुशाला' एक प्रसिद्ध काव्य-कृति बन गई। अमिताभ बच्चन ने एक इंटरव्यू में बताया, "पिताजी ने कभी मदिरा पान नहीं किया। बहुत से लोगों को आश्चर्य होता था कि जब आपने शराब पी नहीं है, तो 'मधुशाला' कैसे लिखी।"
हालांकि, 'मधुशाला' को लेकर विवाद भी हुआ था, जिसमें कहा गया कि यह नई पीढ़ी को गुमराह कर रही है।
यह किस्सा भी उल्लेखनीय है कि 'मधुशाला' के विवाद तक महात्मा गांधी पहुंचे। उन्होंने हरिवंश राय बच्चन को बुलाया और कहा कि पढ़ो तुमने क्या लिखा है। जब बच्चन ने पढ़कर सुनाया, तो गांधी जी ने कहा, 'इसमें कोई खराबी नहीं है।' इस पर बच्चन को सुकून मिला।
"मैं कायस्थ कुलोदभव, मेरे पुरखों ने इतना ढाला, मेरे तन के लोहू में है 75 प्रतिशत हाला।" यह उनकी पहचान है, जिसमें उन्होंने अपने कुल का उल्लेख किया।
हरिवंश राय बच्चन ने जीवन की सच्चाई को अपनी कविताओं में दर्शाया। "जितनी सरल बात होगी, उतनी ही लोगों को समझ आएगी।" यही कारण था कि उन्होंने सरल भाषा में लिखने पर जोर दिया।
1935 में हिंदी कविता के आकाश पर चमकते सितारे के रूप में उभरे हरिवंश राय बच्चन को हिंदी का उमर खय्याम माना गया। उनकी आत्मकथा 'क्या भूलूं क्या याद करूं' साहित्य जगत में अद्वितीय मानी जाती है।
उन्होंने अपने जीवन में लेखनी से समाज को रोशन किया। 1966 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया और उन्हें पद्मभूषण (1976), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969) सहित अनेक पुरस्कार मिले।
18 जनवरी 2003 को हिंदी साहित्य के लिए एक दुखद दिन था जब हरिवंश राय बच्चन ने इस दुनिया को अलविदा कहा।