राहुल गांधी के पीएम आवास धरने पर सीजेआई को वकीलों का पत्र, सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान की मांग
सारांश
मुख्य बातें
देशभर के वकीलों के एक समूह ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह 21 जुलाई को विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास 7, लोक कल्याण मार्ग के निकट किए गए धरना-प्रदर्शन पर स्वतः संज्ञान ले। वकील संकेत गुप्ता द्वारा समन्वित और कई उच्च न्यायालयों के अधिवक्ताओं द्वारा हस्ताक्षरित इस ज्ञापन में शीर्ष अदालत से घटना की तथ्यात्मक जाँच का आदेश देने और उच्च-सुरक्षा क्षेत्रों में प्रदर्शनों के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश तय करने की माँग की गई है।
धरने का घटनाक्रम
ज्ञापन के अनुसार, राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, अन्य सांसदों तथा केरल और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों ने बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के प्रधानमंत्री आवास के समीप धरना दिया। वकीलों का आरोप है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को बार-बार हटने का अनुरोध किया और स्थान की संवेदनशीलता से अवगत कराया, किंतु जमावड़ा जारी रहा।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीय राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने व्यक्तिगत रूप से राहुल गांधी से मुलाकात की और उन्हें प्रदर्शन समाप्त करने का अनुरोध करते हुए आश्वासन दिया कि सरकार संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। इसके बावजूद प्रदर्शन कई घंटों तक चलता रहा। अंततः दिल्ली पुलिस ने लगभग तीन घंटे बाद राहुल गांधी और अन्य सांसदों को वहाँ से हटाया।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर वकीलों की चिंताएँ
ज्ञापन में कहा गया है कि 7, लोक कल्याण मार्ग का क्षेत्र 'राष्ट्रीय राजधानी में सबसे अधिक सुरक्षा-संवेदनशील स्थानों में से एक है' और वहाँ किसी भी अनियंत्रित जमावड़े से सुरक्षा-संबंधी ऐसे जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं जो सामान्य सार्वजनिक प्रदर्शनों से कहीं अधिक गंभीर हों। वकीलों ने राहुल गांधी के उस सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला दिया जिसमें उन्होंने नागरिकों को धरने में शामिल होने का आह्वान किया था और तर्क दिया कि इससे 'गंभीर और संभावित सुरक्षा जोखिम' पैदा हो सकते हैं क्योंकि प्रतिक्रिया में आने वाली भीड़ का आकार और संरचना अनिश्चित हो सकती है।
ज्ञापन में यह भी आशंका व्यक्त की गई कि यदि उच्च-सुरक्षा ठिकानों के पास बिना जाँच-पड़ताल के ऐसे प्रदर्शनों की अनुमति मिलती रही तो यह एक गलत मिसाल बन सकती है और देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए दीर्घकालिक खतरा उत्पन्न कर सकती है।
संवैधानिक तर्क
वकीलों ने स्वीकार किया कि विरोध करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ख) के तहत संरक्षित है, किंतु उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह अधिकार अनुच्छेद 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन है। ज्ञापन में कहा गया, 'संविधान आम नागरिक और सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के बीच कोई अंतर नहीं करता — सभी कानून से समान रूप से बंधे हैं।'
सुप्रीम कोर्ट से क्या माँग की गई
वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह इस घटना का स्वतः संज्ञान लेकर उचित तथ्य-खोज जाँच का निर्देश दे और उच्च-सुरक्षा क्षेत्रों के आसपास विरोध-प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए एकसमान, भविष्य के लिए लागू होने वाले दिशानिर्देश तैयार करे। उन्होंने यह भी माँग की कि ऐसे दिशानिर्देश सभी राजनीतिक दलों और समूहों पर समान रूप से लागू हों तथा विरोध के संवैधानिक अधिकार और सुरक्षा की वैध आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करें। यह ज्ञापन ऐसे समय में आया है जब संसद का मानसून सत्र जारी है और विपक्ष सरकार पर दबाव बनाने के लिए सड़क से संसद तक आंदोलन की रणनीति अपना रहा है।