खेल चिंतन शिविर: LG मनोज सिन्हा बोले — गांव और मोहल्लों से निकलते हैं असली चैंपियन
सारांश
Key Takeaways
- उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 25 अप्रैल को श्रीनगर में राष्ट्रीय खेल चिंतन शिविर को संबोधित किया।
- युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा आयोजित यह तीन दिवसीय कार्यक्रम भारत को वैश्विक खेल महाशक्ति बनाने के रोडमैप पर केंद्रित है।
- LG सिन्हा ने कहा कि असली चैंपियन गांवों, मोहल्लों और स्थानीय क्लबों से निकलते हैं, न केवल एलीट एकेडमी से।
- PE शिक्षकों को विज्ञान-गणित शिक्षकों के समान सम्मान, पहचान और संसाधन दिए जाने चाहिए।
- कॉर्पोरेट जगत को केवल प्रायोजक नहीं, बल्कि इस राष्ट्रीय खेल मिशन के सह-निर्माता के रूप में आगे आना चाहिए।
- एक राज्य की सर्वोत्तम खेल कार्यप्रणालियों को अन्य राज्यों के साथ साझा कर अपनाने पर बल दिया गया।
श्रीनगर, 25 अप्रैल। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शनिवार को श्रीनगर में युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय चिंतन शिविर को संबोधित किया। यह तीन दिवसीय कार्यक्रम भारत को एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनाने के लिए नीतिगत रोडमैप, केंद्र-राज्य समन्वय और जमीनी स्तर पर खेल संस्कृति विकसित करने पर केंद्रित है। इसमें विभिन्न राज्यों के खेल मंत्री, खेल प्रशासक, प्रधान सचिव और राष्ट्रीय खेल संघों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।
गांव और मोहल्लों से उठेंगे भारत के भावी चैंपियन
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने जमीनी स्तर पर खेल संस्कृति को बढ़ावा देने की जरूरत पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि सच्चे चैंपियन शायद ही कभी केवल एलीट एकेडमी से निकलते हैं — वे छोटे शहरों, मोहल्लों और स्थानीय क्लबों में खोजे जाते हैं, जहां बाद में अकादमियां उनकी प्रतिभा को तराशती हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि खेलों को केवल स्टेडियम और प्रतियोगिताओं तक सीमित न रखकर, इन्हें मोहल्लों, सड़कों और खुले मैदानों में भी पनपने का अवसर देना होगा। खेल को दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाना ही भारत की असली ताकत होगी।
शारीरिक शिक्षा शिक्षकों को मिले उचित सम्मान और संसाधन
उपराज्यपाल ने कार्यक्रम में उपस्थित खेल मंत्रियों और खेल प्रशासकों से आग्रह किया कि स्कूलों में शारीरिक शिक्षा शिक्षकों को प्रतिभाओं को पहचानने और निखारने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
उन्होंने कहा कि स्कूलों में PE शिक्षकों को अक्सर विज्ञान या गणित के शिक्षकों की तुलना में कम महत्व दिया जाता है और यह मानसिकता बदलनी चाहिए। भारत को खेल महाशक्ति बनाने की यात्रा में हर शारीरिक शिक्षा शिक्षक की अहम भूमिका है और वे सम्मान, पहचान तथा संसाधनों के पूरे हकदार हैं।
खेल को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाने की पुकार
उपराज्यपाल सिन्हा ने कहा कि केवल पदक जीतना ही खेलों का उद्देश्य नहीं होना चाहिए — खेलों को सामाजिक परिवर्तन की शक्ति के रूप में भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्कूलों, समुदायों, स्थानीय प्रशासन और परिवारों को मिलकर ऐसा इकोसिस्टम बनाना होगा जहां हर युवा एथलीट को — चाहे वह रनिंग ट्रैक पर हो, फुटबॉल मैदान पर या स्विमिंग पूल में — अपनी क्षमता पहचानने का मंच मिले।
उन्होंने केंद्र सरकार की योजनाओं को दूरदराज के प्रतिभासंपन्न गांवों तक पहुंचाने और एक राज्य की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को दूसरे राज्यों में भी अपनाने की वकालत की।
कॉर्पोरेट जगत से सह-निर्माता बनने की अपील
उपराज्यपाल ने कॉर्पोरेट जगत से भी आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह कार्य केवल सरकार अकेले नहीं कर सकती और कॉर्पोरेट को केवल प्रायोजक की भूमिका से आगे बढ़कर इस राष्ट्रीय मिशन के सह-निर्माता बनना चाहिए।
उन्होंने देश की खेल परिषदों, महासंघों, प्रशासकों, उद्योग जगत के नेताओं और अधिकारियों से आग्रह किया कि वे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के अनुरूप एक रणनीतिक विकास योजना तैयार करें और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों तथा उन्हें मिलने वाले अवसरों के बीच की खाई को पाटें।
ऐतिहासिक संदर्भ और व्यापक प्रभाव
यह चिंतन शिविर ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब भारत 2036 ओलंपिक की मेजबानी की दावेदारी कर रहा है और 2028 लॉस एंजेलिस ओलंपिक की तैयारियां जोरों पर हैं। गौरतलब है कि पेरिस 2024 में भारत केवल 6 पदक ही जीत पाया था — 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश के लिए यह संख्या अपेक्षाकृत कम मानी जाती है।
इस तीन दिवसीय आयोजन के समापन के बाद युवा मामले और खेल मंत्रालय एक संयुक्त कार्ययोजना जारी कर सकता है, जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए खेल विकास का खाका तैयार करेगी और आगामी राष्ट्रीय खेल नीति के मसौदे में शामिल की जा सकती है।