लखनऊ में बाघ और तेंदुए के अंगों की तस्करी में छह दोषियों को मिली सजा
सारांश
Key Takeaways
- सीबीआई कोर्ट ने बाघ और तेंदुए के अंगों की तस्करी में दोषियों को सजा दी।
- दोषियों को 10,000 रुपए का जुर्माना और दो साल की कैद।
- यह मामला वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत महत्वपूर्ण है।
- जांच में आरोपियों की सक्रिय संलिप्तता साबित हुई।
- यह निर्णय तस्करी के खिलाफ एक कड़ा निवारक बनेगा।
लखनऊ, 31 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अदालत ने लखनऊ में बाघ और तेंदुए के अंगों के अवैध संग्रहण और तस्करी से संबंधित एक गंभीर वन्यजीव तस्करी मामले में छह आरोपियों—मुमताज अहमद, जैबुन निशा, अजीज उल्लाह, वहीद, सरताज, और मजीद—को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक पर 10,000 रुपए का जुर्माना और दो साल की कैद की सजा सुनाई।
यह मामला एक बड़े बरामदगी अभियान से संबंधित है, जिसमें आरोपियों के घरों से प्रतिबंधित वन्यजीव वस्तुओं की बड़ी मात्रा मिली थी। जब्त की गई वस्तुओं में तेंदुए के 18,000 नाखून, 74 तेंदुए की खालें, चार बाघ की खालें और बाघ और तेंदुए की हड्डियाँ शामिल हैं। ये वस्तुएँ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत आती हैं, जो इन्हें उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्रदान करती है और इनके संग्रहण, व्यापार या परिवहन पर सख्त प्रतिबंध लगाती है।
सीबीआई ने यह मामला 23 मार्च 2000 को दर्ज किया था और गहन जांच के बाद 15 जुलाई 2000 को लखनऊ के सक्षम न्यायालय में शिकायत (चार्जशीट) दायर की थी। जांच में आरोपियों की संगठित तस्करी और अवैध व्यापार में संलिप्तता साबित हुई।
अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने सभी छह आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 49 बी और धारा 51 के तहत मुख्य अपराधों के लिए जिम्मेदार पाया।
अधिकारियों का कहना है कि यह दोषसिद्धि वन्यजीव अपराधों के खिलाफ सीबीआई की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह उम्मीद की जाती है कि यह निर्णय वन्यजीव तस्करी में शामिल अपराधियों के लिए एक कड़ा निवारक बनेगा और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में मदद करेगा।