मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: भ्रष्टाचार में फंसे सरकारी कर्मचारियों पर आपराधिक मामले के साथ-साथ विभागीय कार्रवाई भी अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने 3 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि किसी सेवारत सरकारी कर्मचारी का भ्रष्टाचार के मामले में संलिप्त होना अत्यंत गंभीर है और किसी भी हालत में उसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक मुकदमा लंबित होना विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई आरंभ करने में कानूनी बाधा नहीं है — दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ चल सकती हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति पुगाझेंधी उन पाँच सरकारी कर्मचारियों — सुनीथा, अखिलिन मेबल, इत्तुराज, गणेसामूर्ति और रविचंद्रन — की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे, जिन्हें सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) की छापेमारी के दौरान कथित तौर पर रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के पश्चात् इन्हें सेवा से निलंबित कर दिया गया था।
इन सभी याचिकाकर्ताओं ने अपने निलंबन आदेश को रद्द करने की माँग करते हुए मदुरै पीठ का दरवाज़ा खटखटाया था। उनका तर्क था कि आपराधिक मामले की सुनवाई अभी जारी है, इसलिए विभागीय कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
अदालत की कड़ी टिप्पणी
न्यायमूर्ति पुगाझेंधी ने सुनवाई के दौरान कहा कि ये याचिकाकर्ता कई वर्षों से बिना कोई कार्य किए केवल निर्वाह भत्ता प्राप्त करते रहे हैं, जबकि उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई तक शुरू नहीं की गई। अदालत ने इसे प्रशासनिक शिथिलता का स्पष्ट उदाहरण बताया।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, 'किसी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होना उसके कदाचार के लिए विभागीय कार्यवाही शुरू करने में बाधा नहीं है। सरकारी सेवा में आचरण नियमों का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना प्रशासन की ईमानदारी बनाए रखने के लिए अधिकारियों का दायित्व है।'
प्रशासनिक अखंडता पर जोर
पीठ ने यह भी कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का सरकारी सेवा में बने रहना प्रशासन की निष्पक्षता और अखंडता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। गौरतलब है कि यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब कई राज्यों में भ्रष्टाचार के आरोपों में फँसे कर्मचारियों के विभागीय मामले वर्षों से लंबित पड़े हैं।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की भ्रष्टाचार-मुक्त समाज बनाने की प्रतिबद्धता तभी विश्वसनीय बनेगी जब ऐसे कर्मचारियों के विरुद्ध तत्काल और ठोस अनुशासनात्मक कदम उठाए जाएँ। अदालत के अनुसार, यह कदम अन्य कर्मचारियों पर भी निवारक प्रभाव डालेगा।
सरकार को सिफारिश
मदुरै पीठ ने राज्य सरकार को यह सिफारिश भी की कि सरकारी कर्मचारियों के आचरण नियमों में आवश्यक संशोधन किए जाएँ, ताकि ऐसे मामलों का स्थायी और व्यवस्थित समाधान सुनिश्चित हो सके। यह पहली बार नहीं है जब किसी उच्च न्यायालय ने सेवा नियमों में बदलाव की ज़रूरत जताई हो, लेकिन छापेमारी में रंगे हाथ पकड़े गए कर्मचारियों के मामले में इतनी कड़ी निर्देशात्मक भाषा अपेक्षाकृत विरल है।
छह महीने की समयसीमा और परिणाम
न्यायालय ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही छह महीने के भीतर पूरी की जाए। साथ ही चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समयसीमा में कार्रवाई नहीं हुई, तो कार्यवाही शुरू करने और उसे संचालित करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई का आदेश दिया जा सकता है। इन निर्देशों के साथ न्यायमूर्ति पुगाझेंधी ने सभी याचिकाओं का निपटारा कर दिया। यह फैसला देशभर में भ्रष्टाचार के मामलों में फँसे सरकारी कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई की गति तय करने की मिसाल बन सकता है।