2 नवंबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने केएन नेहरू की याचिका खारिज की, MAWS भर्ती घोटाले में FIR का रास्ता साफ

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सुप्रीम कोर्ट ने केएन नेहरू की याचिका खारिज की, MAWS भर्ती घोटाले में FIR का रास्ता साफ

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने DMK के वरिष्ठ नेता केएन नेहरू की याचिका खारिज कर MAWS भर्ती घोटाले में FIR और DVAC जाँच का रास्ता साफ कर दिया। ₹630–1,020 करोड़ की कथित रिश्वत और 2,538 पदों पर अनियमितताओं के आरोपों वाला यह मामला अब तमिलनाडु की नई सरकार के तहत आगे बढ़ेगा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 2 नवंबर 2026 को केएन नेहरू की याचिका खारिज कर मद्रास उच्च न्यायालय के FIR निर्देश को बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने 20 फरवरी और 26 अक्टूबर के उच्च न्यायालय के आदेशों में हस्तक्षेप से इनकार किया।
आरोप MAWS विभाग में 2,538 पदों पर भर्ती में रिश्वत से जुड़े हैं; ED ने अवैध राशि ₹630 करोड़ से ₹1,020 करोड़ के बीच आँकी है।
ED के साक्ष्यों में व्हाट्सएप बातचीत, स्क्रीनशॉट और वित्तीय रिकॉर्ड शामिल हैं, जो तलाशी में बरामद हुए थे।
2026 विधानसभा चुनावों के बाद तमिलनाडु की नई सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार की पुनर्विचार याचिका वापस ली और DVAC ने FIR दर्ज कर ली।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ केएन नेहरू को अपना बचाव प्रस्तुत करने से नहीं रोकेंगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 2 नवंबर 2026 को तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के वरिष्ठ नेता केएन नेहरू की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने राज्य के नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग (MAWS) में भर्ती से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में एफआईआर दर्ज करने के मद्रास उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती दी थी। न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेशों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और जाँच का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के 20 फरवरी के उस आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया, जिसमें सतर्कता एवं भ्रष्टाचार विरोधी निदेशालय (DVAC) को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा साझा की गई सामग्री के आधार पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही, उच्च न्यायालय द्वारा 26 अक्टूबर को नेहरू की पुनर्विचार याचिका खारिज करने के आदेश को भी यथावत बनाए रखा गया।

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ केएन नेहरू को उचित समय पर अपना बचाव प्रस्तुत करने से नहीं रोकेंगी। इस प्रकार न्यायालय ने जाँच पर रोक लगाने से तो इनकार कर दिया, किंतु अभियुक्त के प्रक्रियागत अधिकारों की भी रक्षा की।

आरोप और साक्ष्य

ये आरोप उस दौर से जुड़े हैं जब केएन नेहरू MAWS विभाग के मंत्री थे। ईडी के अनुसार, उस अवधि में विभाग के 2,538 पदों पर हुई भर्ती में नौकरियों के बदले रिश्वत का एक संगठित तंत्र संचालित था। ईडी ने अवैध रिश्वत की राशि ₹630 करोड़ से ₹1,020 करोड़ के बीच आँकी है।

अक्टूबर 2025 में ईडी ने तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को मंत्री और उनके सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग करते हुए सामग्री भेजी थी। एजेंसी ने व्हाट्सएप बातचीत, स्क्रीनशॉट, तबादला आदेश और वित्तीय रिकॉर्ड सहित डिजिटल साक्ष्यों का हवाला दिया, जो मंत्री से जुड़े व्यक्तियों के परिसरों की तलाशी के दौरान बरामद किए गए थे। आरोपों में सरकारी नियुक्तियों के बदले रिश्वत लेने के साथ-साथ निविदा प्रक्रियाओं में हेरफेर भी शामिल है।

मामले की पृष्ठभूमि

राज्य अधिकारियों द्वारा एफआईआर दर्ज करने में विफल रहने के बाद यह मामला मद्रास उच्च न्यायालय पहुँचा था। 20 फरवरी को उच्च न्यायालय ने DVAC को एफआईआर दर्ज कर जाँच करने का निर्देश दिया। इसके बाद केएन नेहरू और तत्कालीन DMK के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने पुनर्विचार याचिकाएँ दायर कीं।

गौरतलब है कि 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद तमिलनाडु में सरकार परिवर्तन हुआ। नई सरकार ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि DVAC ने एफआईआर दर्ज कर ली है और वह पूर्ववर्ती सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका वापस लेना चाहती है। उच्च न्यायालय ने 26 अक्टूबर को नेहरू की स्वतंत्र पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उसका पूर्व निर्देश केवल एफआईआर दर्ज करने और जाँच तक सीमित था — यह किसी व्यक्ति के अपराध का निर्धारण नहीं करता।

नेहरू का तर्क और न्यायालय का रुख

केएन नेहरू ने सर्वोच्च न्यायालय में तर्क दिया था कि उन्हें सुनवाई का प्रभावी अवसर दिए बिना आदेश पारित किया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ। सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क से सहमति नहीं जताई और उच्च न्यायालय के आदेशों को बरकरार रखा।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद DVAC की जाँच बिना किसी न्यायिक अवरोध के आगे बढ़ सकती है। यह ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु में नई सरकार ने मामले को आगे बढ़ाने में रुचि दिखाई है। केएन नेहरू के पास अब भी कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं और वे उचित समय पर अपना पक्ष जाँच एजेंसी के समक्ष रख सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो न्यायपालिका कितनी दूर तक सक्रिय हो सकती है। मद्रास उच्च न्यायालय का ED की सामग्री के आधार पर DVAC को FIR का निर्देश और अब सर्वोच्च न्यायालय की मुहर — यह संकेत देता है कि अदालतें राज्य की निष्क्रियता को जवाबदेही की दीवार बनने देने को तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर, सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार का पुनर्विचार याचिका वापस लेना यह भी रेखांकित करता है कि राज्य में जाँच की गति कई बार न्यायिक नहीं, राजनीतिक घड़ी से तय होती है। असली कसौटी यह होगी कि क्या DVAC की जाँच साक्ष्यों की कसौटी पर टिकती है या राजनीतिक दबाव में बिखर जाती है।
RashtraPress
2 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केएन नेहरू पर क्या आरोप हैं?
केएन नेहरू पर आरोप है कि तमिलनाडु के MAWS विभाग के मंत्री रहते हुए उन्होंने 2,538 पदों पर भर्ती में नौकरियों के बदले रिश्वत ली। ED ने अवैध रिश्वत की राशि ₹630 करोड़ से ₹1,020 करोड़ के बीच आँकी है और निविदा प्रक्रियाओं में हेरफेर के भी आरोप हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने केएन नेहरू की याचिका क्यों खारिज की?
सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि मद्रास उच्च न्यायालय के आदेशों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय का निर्देश केवल FIR दर्ज करने और जाँच तक सीमित था और किसी के अपराध का निर्धारण नहीं करता था।
DVAC और ED की इस मामले में क्या भूमिका है?
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अक्टूबर 2025 में तमिलनाडु के DGP को साक्ष्य सामग्री भेजकर कार्रवाई की माँग की थी। इसके बाद मद्रास उच्च न्यायालय ने DVAC को उस सामग्री के आधार पर FIR दर्ज करने और जाँच करने का निर्देश दिया, जिसे अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा है।
तमिलनाडु में सरकार बदलने का इस मामले पर क्या असर पड़ा?
2026 के विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता परिवर्तन के साथ नई सरकार ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि DVAC ने FIR दर्ज कर ली है और उसने पूर्ववर्ती सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका वापस ले ली। इससे मामले में एक नया मोड़ आया और जाँच की बाधाएँ दूर हुईं।
क्या केएन नेहरू के पास अब कोई कानूनी विकल्प बचा है?
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ नेहरू को उचित समय पर अपना बचाव प्रस्तुत करने से नहीं रोकेंगी। वे DVAC की जाँच प्रक्रिया में अपना पक्ष रख सकते हैं और भविष्य में अन्य कानूनी उपाय भी अपना सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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