मद्रास हाईकोर्ट ने के.एन. नेहरू की पुनर्विचार याचिका खारिज की, भ्रष्टाचार एफआईआर का रास्ता साफ
सारांश
मुख्य बातें
मद्रास उच्च न्यायालय ने सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु के पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) नेता के.एन. नेहरू की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। यह याचिका प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा साझा की गई सामग्री के आधार पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज करने के न्यायालय के पूर्व निर्देश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी। इस फैसले के साथ ही सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (DVAC) द्वारा आगे की कार्यवाही का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
मुख्य घटनाक्रम
मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने यह याचिका खारिज की। याचिका में फरवरी के उस आदेश पर पुनर्विचार की माँग की गई थी, जिसमें DVAC को तत्काल एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। नेहरू और उनके भाइयों ने तर्क दिया था कि आदेश पारित करने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना गया, जो 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
राज्य सरकार का बदला रुख
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने भी शुरू में पुनर्विचार की माँग की थी। 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद नई सरकार के सत्ता में आने पर उसका रुख पलट गया। एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने न्यायालय को सूचित किया कि DVAC ने नेहरू के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है और सरकार अपनी पुनर्विचार याचिका वापस लेना चाहती है।
पीठ ने पूछा कि जब राज्य ने पहले कोई कार्रवाई न करने का आश्वासन दिया था, तो एफआईआर कैसे दर्ज हो गई? नारायण ने स्पष्ट किया कि पिछली सरकार के निर्देशों पर दिया गया पूर्व एडवोकेट जनरल का आश्वासन नई सरकार पर बाध्यकारी नहीं है। इसके बाद न्यायालय ने सुनवाई पूरी होने तक नेहरू के खिलाफ किसी भी कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी थी।
दोनों पक्षों की दलीलें
नेहरू की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि एफआईआर का आदेश पारित होने से पूर्व उनके मुवक्किल को अपना पक्ष रखने का मौलिक अधिकार था। उन्होंने कहा कि 'प्राकृतिक न्याय' के उल्लंघन की स्थिति में पुनर्विचार याचिका की स्वीकार्यता पर आपत्तियों के बावजूद मामले पर पुनर्विचार होना चाहिए।
DVAC की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने इसका खंडन करते हुए कहा कि कानूनी प्रावधानों के अनुसार एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने से पहले आरोपी का पक्ष सुनना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 362 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि उच्च न्यायालय सहित किसी भी न्यायालय को आपराधिक मामलों में अपने फैसलों पर पुनर्विचार की अनुमति नहीं है। दवे ने यह भी प्रश्न उठाया कि क्या नेहरू किसी अन्य व्यक्ति की याचिका पर पारित आदेश के विरुद्ध पुनर्विचार की माँग कर सकते हैं।
विलंब पर न्यायालय की टिप्पणी
एडवोकेट जनरल नारायण ने यह भी तर्क दिया कि नेहरू को इस कार्यवाही की जानकारी थी, फिर भी वे आदेश आने तक प्रतीक्षारत रहे और तत्पश्चात उसे चुनौती दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने मुकदमे की कार्यवाही में देरी करते हुए एक वरिष्ठ मंत्री को बचाने का प्रयास किया था।
आगे क्या होगा
दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था और अंतरिम सुरक्षा को बनाए रखा था। सोमवार को न्यायालय ने याचिका खारिज कर अपना फैसला सुना दिया। अब DVAC के समक्ष आगे की जाँच का मार्ग खुल गया है, हालाँकि न्यायालय के अंतरिम आदेश की सीमाओं को लेकर स्थिति स्पष्ट होना अभी शेष है।