24 सितंबर 2026
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मद्रास हाई कोर्ट ने इस्तीफा देने वाले विधायकों पर 5 साल प्रतिबंध की याचिका खारिज की

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मद्रास हाई कोर्ट ने इस्तीफा देने वाले विधायकों पर 5 साल प्रतिबंध की याचिका खारिज की

सारांश

मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया — चुनाव कानून बदलना अदालत का काम नहीं। इस्तीफा देने वाले विधायकों पर 5 साल प्रतिबंध और उपचुनाव खर्च वसूलने की माँग को खारिज करते हुए बेंच ने यह जिम्मेदारी संसद और विधानमंडलों पर डाल दी।

मुख्य बातें

मद्रास हाई कोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को इस्तीफा देने वाले विधायकों पर 5 साल के चुनावी प्रतिबंध की जनहित याचिका खारिज की।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता सुधन (सैदापेट, चेन्नई) ने माँग की थी कि ऐसे विधायक उपचुनाव का पूरा खर्च वहन करें।
चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी.
अरुल मुरुगन की बेंच ने फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार के सुधारों के लिए संसद या विधानसभा में कानून बनाना होगा, न्यायिक आदेश पर्याप्त नहीं।
मदुरंतकम और धारापुरम उपचुनावों पर अंतरिम रोक की माँग भी अस्वीकार।
चुनाव आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि विधायक के इस्तीफे में उसकी कोई भूमिका नहीं होती।

मद्रास हाई कोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें राजनीतिक कारणों से इस्तीफा देने वाले विधायकों पर पाँच वर्षों के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने और उपचुनाव का खर्च उनसे वसूलने की माँग की गई थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस तरह के बदलाव न्यायिक आदेश से नहीं, बल्कि विधायी प्रक्रिया के ज़रिए ही संभव हैं।

क्या थी याचिका और किसने दायर की

चेन्नई के सैदापेट निवासी अधिवक्ता सुधन ने यह याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि जो विधायक चुनाव जीतने के तुरंत बाद इस्तीफा दे देते हैं, वे मतदाताओं के जनादेश का अनादर करते हैं और सार्वजनिक खजाने पर उपचुनाव का अतिरिक्त बोझ डालते हैं।

याचिका में चुनाव आयोग को निर्देश देने का आग्रह किया गया था कि ऐसे पूर्व विधायक नामांकन दाखिल करते समय उपचुनाव का पूरा खर्च जमा करें। साथ ही एक कानूनी संशोधन की माँग भी थी जो राजनीतिक कारणों से पद छोड़ने वाले जनप्रतिनिधियों को पाँच वर्षों तक चुनाव मैदान में उतरने से रोके।

उपचुनावों पर अंतरिम रोक की अपील भी नामंज़ूर

सुधन ने एक अंतरिम उपाय के रूप में यह भी अनुरोध किया था कि याचिका पर अंतिम फैसला होने तक मदुरंतकम और धारापुरम निर्वाचन क्षेत्रों में प्रस्तावित उपचुनावों पर रोक लगाई जाए। न्यायालय ने यह माँग भी स्वीकार नहीं की।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने यह परिदृश्य रखा कि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि जीत के मात्र दो सप्ताह के भीतर इस्तीफा देकर किसी दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में पुनः चुनाव लड़ सकता है। उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि यदि बड़ी संख्या में विधायक एक साथ इस्तीफा दें, तो उससे निपटने की क्या व्यवस्था होगी।

चुनाव आयोग का पक्ष

चुनाव आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि परिणाम घोषित होने के बाद किसी विधायक के इस्तीफे के फैसले में उसकी कोई भूमिका नहीं होती। आयोग ने यह भी तर्क दिया कि याचिका न्यायिक विचार के योग्य नहीं है।

अदालत का फैसला और कानूनी आधार

चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा और बाद में याचिका खारिज कर दी।

बेंच ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता जिन सुधारों की माँग कर रहे हैं, उनके लिए विधायी संशोधन की आवश्यकता होगी — यह कार्य संसद या संबंधित विधानसभा का है, न कि न्यायालय का। न्यायालय ने कहा कि वह अदालती आदेश के माध्यम से चुनाव कानून में इस प्रकार के परिवर्तन नहीं थोप सकता।

आगे क्या हो सकता है

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह के प्रश्न न्यायालयों के सामने आए हों। देश के विभिन्न हिस्सों में विधायकों द्वारा सामूहिक इस्तीफे की राजनीतिक रणनीति पर बहस लंबे समय से चली आ रही है। यह मामला संसद और राज्य विधानमंडलों को एक नीतिगत संकेत देता है कि इस समस्या के समाधान के लिए उन्हें ही पहल करनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन इस दिशा में एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और हर बार उपचुनाव का खर्च जनता उठाती है। जब तक संसद जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में ठोस संशोधन नहीं लाती, इस तरह की याचिकाएँ आती रहेंगी और खारिज होती रहेंगी।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मद्रास हाई कोर्ट ने यह याचिका क्यों खारिज की?
अदालत ने कहा कि याचिका में माँगे गए बदलाव — जैसे विधायकों पर 5 साल का चुनावी प्रतिबंध और उपचुनाव खर्च वसूली — के लिए कानूनी संशोधन आवश्यक है, जो संसद या विधानसभा का काम है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह अदालती आदेश से चुनाव कानून में बदलाव नहीं कर सकता।
यह याचिका किसने और क्यों दायर की थी?
चेन्नई के सैदापेट के अधिवक्ता सुधन ने यह याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद इस्तीफा देने वाले विधायक मतदाताओं के जनादेश का अपमान करते हैं और जनता पर उपचुनाव का अनावश्यक आर्थिक बोझ डालते हैं।
मदुरंतकम और धारापुरम उपचुनावों से इस याचिका का क्या संबंध था?
याचिकाकर्ता ने अंतरिम राहत के तौर पर इन दोनों निर्वाचन क्षेत्रों के उपचुनावों पर रोक लगाने की माँग की थी, जब तक याचिका पर अंतिम फैसला न हो जाए। अदालत ने यह माँग भी अस्वीकार कर दी।
चुनाव आयोग ने इस मामले में क्या रुख अपनाया?
चुनाव आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि परिणाम घोषित होने के बाद किसी विधायक के इस्तीफे के निर्णय में उसकी कोई भूमिका नहीं होती। आयोग ने यह भी कहा कि याचिका न्यायिक विचार के योग्य नहीं है।
इस समस्या का समाधान अब कैसे होगा?
मद्रास हाई कोर्ट ने संकेत दिया है कि इस समस्या से निपटने के लिए संसद या राज्य विधानसभाओं को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन करना होगा। न्यायालय इस मामले में स्वयं कोई निर्देश जारी नहीं कर सकता।
राष्ट्र प्रेस
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