मद्रास हाई कोर्ट ने पूर्व विधायकों पर PIL खारिज की, वकील पर ₹1 लाख जुर्माना
सारांश
मुख्य बातें
मद्रास हाई कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को चेन्नई के वकील एस. काशी रामलिंगम द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए उन पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया। याचिका में तमिलनाडु के छह पूर्व विधायकों से उनके इस्तीफे के कारण हुए उपचुनाव का खर्च वसूलने और उन्हें मौजूदा विधानसभा कार्यकाल में पुनः चुनाव लड़ने से रोकने की माँग की गई थी। अदालत ने यह याचिका इसलिए भी खारिज की क्योंकि इसमें उठाए गए मुद्दे एक सप्ताह पहले ही एक अन्य समान याचिका में निपटाए जा चुके थे।
मुख्य घटनाक्रम
चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह याचिका प्रचार पाने के उद्देश्य से दायर की गई प्रतीत होती है। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि 24 सितंबर 2026 को वकील के. सुथन की इसी प्रकृति की एक अन्य याचिका पहले ही निरस्त की जा चुकी थी, जिसमें समान कानूनी प्रश्नों का निपटारा किया गया था।
रामलिंगम की याचिका में जिन छह पूर्व विधायकों का नाम था, वे हैं — विरालिमलाई के सी. विजयभास्कर, करूर के एमआर विजयभास्कर, अंबा समुद्रम के एसक्की सुबैया, धारापुरम की पी. सत्यभामा, मदुरंतकम की के. मरगथम कुमारवेल और पेरुंदुरई के एस. जयकुमार। इन सभी ने अपनी-अपनी विधानसभा सीटों से इस्तीफा दिया था।
अदालत का कानूनी तर्क
24 सितंबर के फैसले में बेंच ने स्पष्ट किया था कि मौजूदा कानून उन विधायकों पर कोई वित्तीय देनदारी या चुनावी प्रतिबंध नहीं लगाता जो इस्तीफा देकर उपचुनाव के माध्यम से विधानसभा में वापस आना चाहते हैं। अदालत ने कहा, 'विधायी सीट से इस्तीफा देने का अधिकार स्वयं संवैधानिक व्यवस्था का एक अंग है, और इसे न्यायिक आदेश द्वारा कानून से परे अतिरिक्त शर्तों के बोझ तले नहीं दबाया जा सकता।'
अदालत ने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 324 भारत के चुनाव आयोग (ECI) को अयोग्यता के लिए नए आधार जोड़ने की शक्ति नहीं देता। इसलिए न्यायालय आयोग को ऐसी शक्ति के प्रयोग का निर्देश नहीं दे सकता जो विधि ने उसे प्रदान ही नहीं की है।
सरकारी खर्च पर चिंता, लेकिन समाधान संसद के पास
अदालत ने उपचुनाव कराने में होने वाले सरकारी व्यय को लेकर जताई गई चिंताओं को स्वीकार किया, परंतु स्पष्ट किया कि इन चिंताओं के आधार पर न्यायिक आदेश से पाबंदियाँ लगाना उचित नहीं है। बेंच ने कहा कि यदि विधायकों को राजनीतिक निष्ठा बदलने के लिए इस्तीफा देकर तुरंत उसी क्षेत्र से चुनाव लड़ने से रोकना है, तो इसके लिए संसद को उचित कानून बनाना होगा।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब दल-बदल और इस्तीफे के बाद उपचुनाव की प्रक्रिया को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो रही है। आलोचकों का कहना है कि मौजूदा कानूनी ढाँचे में इस तरह की 'राजनीतिक पुनर्वापसी' को रोकने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
याचिकाकर्ता पर जुर्माने का आधार
बेंच ने पाया कि रामलिंगम की याचिका में उठाए गए सभी कानूनी प्रश्न सुथन के मामले में पहले ही तय किए जा चुके थे। इसी आधार पर याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख का खर्च भरने का आदेश दिया गया। न्यायालयों में दोहराव वाली या प्रचार-प्रेरित PIL पर जुर्माना लगाने की यह प्रवृत्ति उच्च न्यायालयों द्वारा न्यायिक समय के दुरुपयोग को हतोत्साहित करने की दिशा में एक सुस्थापित नीति का हिस्सा है।
क्या होगा आगे
अदालत के इस फैसले के बाद विधायकों के इस्तीफे और उपचुनाव से जुड़े कानूनी सुधार का दबाव अब संसद पर आ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक विधायी स्तर पर स्पष्ट प्रावधान नहीं किए जाते, इस तरह की याचिकाएँ भविष्य में भी दायर होती रहेंगी।