27 अक्टूबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट का नोटिस: बेवजह इस्तीफा देने वाले विधायकों से उपचुनाव खर्च वसूली की मांग पर केंद्र ECI को जवाब तलब

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सुप्रीम कोर्ट का नोटिस: बेवजह इस्तीफा देने वाले विधायकों से उपचुनाव खर्च वसूली की मांग पर केंद्र ECI को जवाब तलब

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर नोटिस जारी किया है जो दो दशक पुरानी चुनाव आयोग की सिफारिश को ज़िंदा करती है — बेवजह इस्तीफा देने वाले विधायकों से उपचुनाव का पूरा खर्च वसूलो। तमिलनाडु के AIADMK के 6 पूर्व विधायकों का रणनीतिक इस्तीफा इस बहस का केंद्र है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को बेवजह इस्तीफा देने वाले विधायकों से उपचुनाव खर्च वसूली की याचिका पर नोटिस जारी किया।
नोटिस केंद्र सरकार , चुनाव आयोग (ECI) , तमिलनाडु के मुख्य चुनाव अधिकारी और AIADMK के 6 पूर्व विधायकों को भेजा गया।
याचिका में 'चुनाव व्यय सुरक्षा' प्रणाली और बेवजह इस्तीफा देने वालों के लिए 5 वर्षों की अयोग्यता की माँग की गई है।
चुनाव आयोग ने 2004 में ऐसी ही सिफारिश की थी, जो अब तक लागू नहीं हुई।
मद्रास हाईकोर्ट ने 24 सितंबर को यह कहते हुए पीआईएल खारिज की थी कि यह विधायी नीति का क्षेत्र है, न्यायिक निर्देश का नहीं।

सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को एक महत्वपूर्ण याचिका पर नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग (ECI) और अन्य पक्षों से जवाब तलब किया है। याचिका में माँग की गई है कि बिना किसी कानूनी रूप से मान्य कारण के अपनी विधानसभा सीट से स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले और फिर चुनाव लड़ने वाले जनप्रतिनिधियों से उपचुनाव पर हुए सरकारी खर्च की वसूली की जाए। यह याचिका विशेष रूप से तमिलनाडु में AIADMK के छह पूर्व विधायकों के मामले से उपजी है, जिन्होंने चुनाव के कुछ हफ्तों के भीतर ही सीटें छोड़ दी थीं।

मामले की पृष्ठभूमि

4 मई को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के कुछ सप्ताह बाद ही AIADMK के छह विधायकों ने अपनी अपनी सीटों से इस्तीफा दे दिया और बाद में सत्तारूढ़ दल में शामिल हो गए। याचिका के अनुसार, इन विधायकों पर पहले से पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करने के आरोप में अयोग्यता की कार्यवाही चल रही थी, और इस्तीफे ने उन्हें उस कार्यवाही से बचाने का काम किया। इन इस्तीफों के परिणामस्वरूप हुए उपचुनावों ने सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाला।

याचिकाकर्ता की मुख्य मांगें

वकील के. सुथन द्वारा दायर इस याचिका में 'चुनाव व्यय सुरक्षा' प्रणाली लागू करने का निर्देश देने की माँग की गई है। इस प्रणाली के तहत बिना कानूनी रूप से मान्य ठोस कारण के इस्तीफा देने वाले विधायक को दोबारा चुनाव लड़ने से पहले उपचुनाव की पूरी लागत के बराबर राशि जमा करनी होगी। इसके अतिरिक्त, ऐसे विधायकों के लिए पाँच वर्षों की चुनावी अयोग्यता की भी माँग की गई है।

मद्रास हाईकोर्ट का रुख और सुप्रीम कोर्ट तक की यात्रा

याचिकाकर्ता ने पहले मद्रास हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने 24 सितंबर को कहा था कि "किसी विधायी सीट से इस्तीफा देने का अधिकार स्वयं सदन की सदस्यता को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक योजना का एक पहलू है और न्यायिक आदेश द्वारा इस पर अतिरिक्त वैधानिक शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं।" हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि प्रस्तावित वित्तीय और दंडात्मक ढाँचा न्यायिक निर्देशों के नहीं, बल्कि विधायी नीति के दायरे में आता है।

चुनाव आयोग की पुरानी सिफारिश

याचिका में एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी उठाया गया है कि चुनाव आयोग ने 2004 में चुनाव सुधारों के लिए अपने प्रस्तावों में स्वयं सिफारिश की थी कि अपनी सीट छोड़कर उपचुनाव कराने वाले उम्मीदवारों को संबंधित खर्च स्वयं वहन करना चाहिए। गौरतलब है कि यह सिफारिश दो दशक से अधिक समय बाद भी लागू नहीं हुई है।

बेंच और नोटिस

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, तमिलनाडु के मुख्य चुनाव अधिकारी और सीट छोड़ने वाले छह पूर्व विधायकों सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। यह मामला अब चुनावी जवाबदेही और संसदीय नैतिकता के व्यापक प्रश्न को अदालत के सामने रखता है — और देशभर में राजनीतिक दलबदल की आड़ में होने वाले रणनीतिक इस्तीफों पर लगाम लगाने की दिशा में एक अहम पड़ाव बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और जनता के पैसे से उपचुनाव। चुनाव आयोग ने 2004 में ही इस पर लगाम लगाने की सिफारिश की थी, लेकिन दो दशक बाद भी वह काग़ज़ पर ही है — जो यह बताता है कि सुधार की इच्छाशक्ति सत्ता में किसी भी दल की प्राथमिकता नहीं रही। मद्रास हाईकोर्ट ने इसे विधायी क्षेत्र कहकर टाल दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का नोटिस संकेत देता है कि अदालत इस प्रश्न को गंभीरता से ले रही है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या न्यायपालिका संसद की ओर उँगली उठाकर विधायी जवाबदेही की माँग करती है, या इसे फिर से 'संविधान की सीमाओं' के नाम पर लौटा देती है।
RashtraPress
27 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में किसे नोटिस जारी किया है?
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग (ECI), तमिलनाडु के मुख्य चुनाव अधिकारी और AIADMK के छह पूर्व विधायकों सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस वकील के. सुथन द्वारा दायर याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जारी किया।
याचिका में 'चुनाव व्यय सुरक्षा' प्रणाली क्या है?
याचिकाकर्ता ने माँग की है कि बिना कानूनी रूप से मान्य ठोस कारण के इस्तीफा देने वाले विधायक को दोबारा चुनाव लड़ने से पहले उपचुनाव की पूरी लागत के बराबर राशि जमा करनी होगी। इसके साथ ऐसे विधायकों के लिए पाँच वर्षों की चुनावी अयोग्यता भी प्रस्तावित है।
तमिलनाडु के AIADMK विधायकों का इस मामले से क्या संबंध है?
4 मई को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव नतीजों के कुछ हफ्तों के भीतर AIADMK के छह विधायकों ने अपनी सीटें छोड़ दीं और बाद में सत्तारूढ़ दल में शामिल हो गए। इनमें से कुछ पर पहले से पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करने के आरोप में अयोग्यता की कार्यवाही चल रही थी, और इस्तीफे ने उन्हें उस कार्यवाही से बचाया।
मद्रास हाईकोर्ट ने यह याचिका क्यों खारिज की थी?
मद्रास हाईकोर्ट ने 24 सितंबर को कहा था कि विधायकों के इस्तीफे का अधिकार संवैधानिक योजना का हिस्सा है और न्यायिक आदेश से उस पर अतिरिक्त शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं। अदालत ने माना कि प्रस्तावित वित्तीय और दंडात्मक ढाँचा विधायी नीति का विषय है।
चुनाव आयोग ने इस विषय पर पहले क्या कहा था?
चुनाव आयोग ने 2004 में चुनाव सुधारों के लिए अपने प्रस्तावों में सिफारिश की थी कि अपनी सीट छोड़कर उपचुनाव कराने वाले उम्मीदवारों को संबंधित खर्च स्वयं वहन करना चाहिए। यह सिफारिश दो दशक से अधिक समय बाद भी लागू नहीं की गई है।
राष्ट्र प्रेस
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