मद्रास हाई कोर्ट: पार्टी बदलकर उपचुनाव लड़ना मतदाताओं का 'अपमान', चुनाव आयोग से दिशा-निर्देश बनाने को कहा
सारांश
मुख्य बातें
मद्रास हाई कोर्ट ने बुधवार, 16 सितंबर को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि चुने हुए विधायकों का अपनी सीट से इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में शामिल होना और फिर उसी निर्वाचन क्षेत्र से उपचुनाव लड़ना मतदाताओं तथा उनके मूल जनादेश का 'अपमान' हो सकता है। कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग (ECI) से आग्रह किया कि वह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए इस विषय पर उचित दिशा-निर्देश तैयार करे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह टिप्पणी कोर्ट की द्वितीय खंडपीठ ने चेन्नई के अधिवक्ता के. सुथन द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान की। खंडपीठ में जस्टिस एस.एम. सुब्रमण्यम और जस्टिस के. गोविंदराजन शामिल थे। याचिकाकर्ता ने ऐसे कानूनी उपायों की माँग की है जो चुने हुए प्रतिनिधियों को पार्टी बदलने के बाद इस्तीफा देकर उसी सीट से उपचुनाव लड़ने से रोक सकें।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस प्रवृत्ति से आम चुनाव में मतदाताओं की मूल पसंद कमज़ोर होती है और सार्वजनिक खजाने पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ता है।
तमिलनाडु में ताज़ा घटनाक्रम
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर. सिंगारावेलन ने खंडपीठ को बताया कि तमिलनाडु में इस वर्ष विधानसभा चुनाव के पश्चात अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) के छह विधायकों ने इस्तीफा दिया और बाद में सत्ताधारी दल तमिलगा वेत्री कजगम (TVK) में शामिल हो गए।
इनमें से मरगथम कुमारवेल और पी. सत्यभामा को TVK ने क्रमशः मदुरंतकम और धारापुरम निर्वाचन क्षेत्रों से उम्मीदवार बनाया है। उल्लेखनीय है कि ये दोनों सीटें उन्हीं के इस्तीफे के कारण रिक्त हुई थीं। कोर्ट को यह भी बताया गया कि चुनाव आयोग ने केवल इन्हीं दो सीटों पर उपचुनाव की घोषणा की है, जबकि अन्य रिक्त सीटों पर अभी तक ऐसी कोई अधिसूचना नहीं आई है।
कोर्ट की तीखी टिप्पणियाँ
जस्टिस सुब्रमण्यम ने कहा कि जो विधायक केवल दूसरी पार्टी के टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ने के उद्देश्य से इस्तीफा देते हैं, वे 'शायद लोकतंत्र का मज़ाक उड़ा रहे हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि जिन मतदाताओं ने किसी उम्मीदवार को उसकी पार्टी की विचारधारा के आधार पर चुना था, उन्हें विधायक के व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय के कारण दोबारा मतदान करने पर विवश होना पड़ रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिंगारावेलन ने चेतावनी दी कि यदि इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया तो भविष्य में बड़े पैमाने पर इस्तीफे हो सकते हैं, जिससे बार-बार उपचुनाव होंगे और सरकारी खजाने को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
चुनाव आयोग से क्या माँगा गया
खंडपीठ ने संकेत दिया कि इस मामले की बारीकी से जाँच आवश्यक है। कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि वह इस बात पर विचार करे कि क्या ऐसे इस्तीफों को नियमों के ज़रिये रोका जा सकता है जो केवल पार्टी परिवर्तन और तत्काल पुनर्निर्वाचन के उद्देश्य से दिए जाते हैं। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि चुनाव की निगरानी करना आयोग की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है।
यह मामला भारत में दल-बदल और लोकतांत्रिक जवाबदेही की व्यापक बहस से जुड़ा है। आगे की सुनवाई में यह देखा जाएगा कि चुनाव आयोग इस विषय पर क्या रुख अपनाता है।