धनतेरस पर महाकालेश्वर मंदिर में दीपोत्सव का आगाज़, भांग से सजे बाबा महाकाल की भस्म आरती
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में धनतेरस, 6 नवंबर 2026 को परंपरागत दीपोत्सव का शुभारंभ हुआ, जब बाबा महाकाल का भांग से भव्य शृंगार कर भस्म आरती संपन्न की गई। बड़ी संख्या में श्रद्धालु रात से ही कतारबद्ध होकर बाबा के इस दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए उज्जैन की पावन नगरी पहुँचे। इससे एक दिन पूर्व एकादशी की संध्या आरती में फूलझड़ी जलाकर दीपोत्सव की पारंपरिक शुरुआत की गई थी।
कपाट खुलने का विधान
शुक्रवार तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ बाबा महाकाल के कपाट विधिवत खोले गए। मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष, घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो उठा। कपाट खुलते ही भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और तत्पश्चात दूध, दही, घी, शहद तथा फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ।
भस्म आरती और भांग शृंगार का विधान
पूजा के क्रम में प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर की आरती के बाद बाबा महाकाल ने मुकुट धारण किया। इसके बाद झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के मध्य भस्म आरती का विधान पूरा किया गया। परंपरा के अनुसार बाबा को भांग से भव्य रूप से सजाया गया, जिसके पश्चात उन पर भस्म रमाई गई। बाबा के इस साकार स्वरूप के दर्शन होते ही श्रद्धालुओं ने 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से पूरे परिसर को गुंजायमान कर दिया।
महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा
परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के बाद बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे महाकालेश्वर मंदिर की पहचान माना जाता है।
आम जनता पर असर
बाबा महाकाल की भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए देश के विभिन्न कोनों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उज्जैन पहुँचते हैं। धनतेरस के अवसर पर दीपोत्सव की इस पारंपरिक शुरुआत ने मंदिर परिसर में अभूतपूर्व उत्साह का माहौल बना दिया। आने वाले दिनों में दीपावली के अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या और अधिक बढ़ने की संभावना है।