2 नवंबर 2026
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उज्जैन: महाकालेश्वर मंदिर में मोगरा-गुलाब से बाबा महाकाल का शृंगार, भस्म आरती में राजा स्वरूप के दर्शन

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उज्जैन: महाकालेश्वर मंदिर में मोगरा-गुलाब से बाबा महाकाल का शृंगार, भस्म आरती में राजा स्वरूप के दर्शन

सारांश

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार को मोगरा और गुलाब के फूलों से सजे बाबा महाकाल ने राजा स्वरूप में भक्तों को भस्म आरती के दौरान दर्शन दिए। महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरागत भस्म अर्पण विधि के साथ हज़ारों श्रद्धालु रात से कतार में खड़े रहे।

मुख्य बातें

श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन में 2 नवंबर 2026 को भव्य भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल का शृंगार मोगरा और गुलाब के फूलों से किया गया और उन्होंने राजा स्वरूप में दर्शन दिए।
भगवान वीरभद्र की आज्ञा के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ मंदिर के कपाट खोले गए।
जलाभिषेक व पंचामृत अभिषेक के बाद मुकुट धारण कराया गया, फिर भस्म आरती हुई।
परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म अर्पित की गई।
सोमवार होने के कारण मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से अधिक रही।

उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार, 2 नवंबर 2026 को तड़के बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई, जिसमें उन्हें मोगरा और गुलाब के ताज़े फूलों से सुसज्जित कर राजा स्वरूप में भक्तों को दर्शन दिए गए। रात से ही कतारबद्ध हज़ारों श्रद्धालु इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बने।

मंदिर के कपाट खुलने का क्रम

परंपरागत विधि-विधान के अनुसार, सोमवार की भोर में भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के उपरांत ढोल-नगाड़ों की गूँज के बीच बाबा महाकाल के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के साथ भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और इसके बाद दूध, दही, घी, शहद एवं फलों के रस से निर्मित पंचामृत से विधिवत अभिषेक संपन्न हुआ।

शृंगार और भस्म आरती का विवरण

पूजा के दौरान सर्वप्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर की आरती के पश्चात बाबा महाकाल को मुकुट धारण कराया गया। झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद की मनोहारी ध्वनि के बीच भस्म आरती की गई। बाबा का शृंगार विशेष रूप से मोगरा और गुलाब के फूलों से किया गया, जिससे मंदिर परिसर सुगंधित हो उठा।

महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा

परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पण के पश्चात बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इस आस्था के चलते देशभर से श्रद्धालु उज्जैन की पावन नगरी में एकत्रित होते हैं।

श्रद्धालुओं की भागीदारी

भस्म आरती में राजा स्वरूप में बाबा के दर्शन के लिए रात से ही भारी संख्या में श्रद्धालु कतारबद्ध थे। मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष, घंटियों की टंकार और शंखध्वनि से गुंजायमान रहा। दर्शनों के बाद भक्तों ने स्वयं को धन्य महसूस किया। गौरतलब है कि सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है, इसलिए इस दिन महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक रहती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का आधार है — हर सोमवार लाखों रुपये का तीर्थाटन उद्योग इसी परंपरा के इर्द-गिर्द घूमता है। महाकाल लोक कॉरिडोर के विस्तार के बाद मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लेकिन भीड़ प्रबंधन और दर्शन की पहुँच सुनिश्चित करना अब भी एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बनी हुई है। आस्था की इस अटूट धारा को नीतिगत ढाँचे से जोड़ना — जैसे ऑनलाइन बुकिंग, सुरक्षित कतार व्यवस्था — ही इस धरोहर को टिकाऊ बनाएगा।
RashtraPress
2 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती क्या होती है?
भस्म आरती उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर की सबसे प्राचीन और विशिष्ट पूजा विधि है, जिसमें बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा भस्म चढ़ाने के बाद मान्यता है कि बाबा निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
2 नवंबर 2026 को महाकाल का शृंगार कैसे किया गया?
2 नवंबर 2026 को बाबा महाकाल का शृंगार मोगरा और गुलाब के ताज़े फूलों से किया गया। कपूर आरती के बाद उन्हें मुकुट धारण कराया गया और राजा स्वरूप में भक्तों को दर्शन दिए गए।
भस्म आरती के लिए उज्जैन कब और कैसे पहुँचें?
भस्म आरती प्रतिदिन तड़के होती है और सोमवार को श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से अधिक रहती है। दर्शन के लिए रात से ही कतार लगनी शुरू हो जाती है, इसलिए पहले से ऑनलाइन पास बुक करना उचित रहता है।
महानिर्वाणी अखाड़े की भस्म आरती में क्या भूमिका है?
परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है, जो इस आरती का केंद्रीय और सबसे पवित्र चरण माना जाता है। यह परंपरा सदियों से निर्बाध रूप से चली आ रही है।
सोमवार को महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन का विशेष महत्व क्यों है?
सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए सर्वाधिक शुभ माना जाता है। इस कारण हर सोमवार को महाकालेश्वर मंदिर में सामान्य दिनों की तुलना में श्रद्धालुओं की संख्या काफी अधिक रहती है और भस्म आरती का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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