मन की बात के 135वें एपिसोड में PM मोदी ने हरगिला पक्षी की संरक्षण गाथा सुनाई, अशुभ से गर्व का प्रतीक बना असम का यह दुर्लभ पक्षी
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 जून 2026 को अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 135वें एपिसोड में असम के अत्यंत दुर्लभ पक्षी हरगिला (ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क) की संरक्षण यात्रा को देशवासियों के साथ साझा किया। उन्होंने बताया कि एक समय इस पक्षी को असम के कुछ इलाकों में अशुभ माना जाता था, परंतु सामूहिक जागरूकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने इसे आज गांवों की पहचान और गर्व का प्रतीक बना दिया है।
अशुभ से पहचान तक — हरगिला की बदलती छवि
प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि हरगिला प्रकृति को स्वच्छ रखने में अहम भूमिका निभाने वाला पक्षी है, फिर भी लंबे समय तक इसके प्रति लोगों में गहरी नकारात्मक धारणाएँ बनी रहीं। लोग इसे अपने आसपास देखना पसंद नहीं करते थे। यहाँ तक कि जिन पेड़ों पर हरगिला अपने घोंसले बनाता था, उन्हें भी काट दिया जाता था — जिससे इस प्रजाति का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा था।
जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन का संकल्प
मोदी ने बताया कि इसी विकट स्थिति में जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने सबसे पहले स्थानीय महिलाओं से संवाद स्थापित किया और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर समझाया कि हरगिला पर्यावरण के लिए कितना अनिवार्य है। धीरे-धीरे महिलाएँ इस अभियान से जुड़ती गईं और एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले लिया। जो पक्षी कभी गाँवों से दूर भगाया जाता था, वही आज कई गाँवों की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
हरगिला: पारिस्थितिकी तंत्र का प्राकृतिक सफाईकर्मी
हरगिला दुनिया की सबसे दुर्लभ और विशाल सारस प्रजातियों में से एक है। इसका नाम संस्कृत के दो शब्दों — 'हड' (हड्डी) और 'गिला' (निगलना) — से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'हड्डी निगलने वाला पक्षी'। यह मुख्य रूप से असम और कंबोडिया के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। उल्लेखनीय है कि वैश्विक स्तर पर इस पक्षी की करीब 80 प्रतिशत आबादी अकेले असम में निवास करती है।
यह एक मांसाहारी और मृतभक्षी (स्कैवेंजर) पक्षी है जो सड़े-गले मांस, मृत जीवों और कचरे को खाकर प्राकृतिक सफाईकर्मी की भूमिका निभाता है। आर्द्रभूमि (वेटलैंड) और जलाशयों के आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में इसका योगदान अपरिहार्य है।
सामूहिक भागीदारी का प्रेरक उदाहरण
प्रधानमंत्री ने इस पूरे प्रयास को समाज में जागरूकता और सामूहिक भागीदारी का एक आदर्श उदाहरण बताया। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में वन्यजीव संरक्षण और जैव-विविधता को लेकर जन-चेतना बढ़ाने की माँग तेज हो रही है। गौरतलब है कि हरगिला की यह सफलता-कथा स्थानीय समुदायों — विशेषकर महिलाओं — की भागीदारी के बिना संभव नहीं हो पाती।
आगे की राह
हरगिला संरक्षण की यह कहानी भारत के अन्य लुप्तप्राय वन्यजीवों के लिए एक मॉडल बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, सांस्कृतिक धारणाओं को वैज्ञानिक तथ्यों से जोड़कर बदलने की यह रणनीति देश के अन्य क्षेत्रों में भी अपनाई जा सकती है, जहाँ मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।