28 जून 2026
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मन की बात के 135वें एपिसोड में PM मोदी ने हरगिला पक्षी की संरक्षण गाथा सुनाई, अशुभ से गर्व का प्रतीक बना असम का यह दुर्लभ पक्षी

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मन की बात के 135वें एपिसोड में PM मोदी ने हरगिला पक्षी की संरक्षण गाथा सुनाई, अशुभ से गर्व का प्रतीक बना असम का यह दुर्लभ पक्षी

सारांश

कभी अशुभ मानकर दूर भगाया जाने वाला हरगिला आज असम के गाँवों की पहचान है — यह बदलाव लाया जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन के नेतृत्व में महिलाओं के एक जन-आंदोलन ने। PM मोदी ने 'मन की बात' के 135वें एपिसोड में इस प्रेरक संरक्षण गाथा को देश के सामने रखा।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने 28 जून 2026 को 'मन की बात' के 135वें एपिसोड में असम के दुर्लभ पक्षी हरगिला की संरक्षण कहानी साझा की।
हरगिला को एक समय असम के कुछ इलाकों में अशुभ माना जाता था; घोंसले वाले पेड़ तक काट दिए जाते थे।
जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन ने महिलाओं को जोड़कर जागरूकता अभियान चलाया, जिससे यह पक्षी आज गाँवों का गर्व बन गया।
वैश्विक स्तर पर हरगिला की करीब 80 प्रतिशत आबादी अकेले असम में पाई जाती है।
यह पक्षी एक प्राकृतिक स्कैवेंजर है जो आर्द्रभूमि और जलाशयों के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 जून 2026 को अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 135वें एपिसोड में असम के अत्यंत दुर्लभ पक्षी हरगिला (ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क) की संरक्षण यात्रा को देशवासियों के साथ साझा किया। उन्होंने बताया कि एक समय इस पक्षी को असम के कुछ इलाकों में अशुभ माना जाता था, परंतु सामूहिक जागरूकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने इसे आज गांवों की पहचान और गर्व का प्रतीक बना दिया है।

अशुभ से पहचान तक — हरगिला की बदलती छवि

प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि हरगिला प्रकृति को स्वच्छ रखने में अहम भूमिका निभाने वाला पक्षी है, फिर भी लंबे समय तक इसके प्रति लोगों में गहरी नकारात्मक धारणाएँ बनी रहीं। लोग इसे अपने आसपास देखना पसंद नहीं करते थे। यहाँ तक कि जिन पेड़ों पर हरगिला अपने घोंसले बनाता था, उन्हें भी काट दिया जाता था — जिससे इस प्रजाति का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा था।

जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन का संकल्प

मोदी ने बताया कि इसी विकट स्थिति में जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने सबसे पहले स्थानीय महिलाओं से संवाद स्थापित किया और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर समझाया कि हरगिला पर्यावरण के लिए कितना अनिवार्य है। धीरे-धीरे महिलाएँ इस अभियान से जुड़ती गईं और एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले लिया। जो पक्षी कभी गाँवों से दूर भगाया जाता था, वही आज कई गाँवों की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।

हरगिला: पारिस्थितिकी तंत्र का प्राकृतिक सफाईकर्मी

हरगिला दुनिया की सबसे दुर्लभ और विशाल सारस प्रजातियों में से एक है। इसका नाम संस्कृत के दो शब्दों — 'हड' (हड्डी) और 'गिला' (निगलना) — से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'हड्डी निगलने वाला पक्षी'। यह मुख्य रूप से असम और कंबोडिया के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। उल्लेखनीय है कि वैश्विक स्तर पर इस पक्षी की करीब 80 प्रतिशत आबादी अकेले असम में निवास करती है।

यह एक मांसाहारी और मृतभक्षी (स्कैवेंजर) पक्षी है जो सड़े-गले मांस, मृत जीवों और कचरे को खाकर प्राकृतिक सफाईकर्मी की भूमिका निभाता है। आर्द्रभूमि (वेटलैंड) और जलाशयों के आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में इसका योगदान अपरिहार्य है।

सामूहिक भागीदारी का प्रेरक उदाहरण

प्रधानमंत्री ने इस पूरे प्रयास को समाज में जागरूकता और सामूहिक भागीदारी का एक आदर्श उदाहरण बताया। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में वन्यजीव संरक्षण और जैव-विविधता को लेकर जन-चेतना बढ़ाने की माँग तेज हो रही है। गौरतलब है कि हरगिला की यह सफलता-कथा स्थानीय समुदायों — विशेषकर महिलाओं — की भागीदारी के बिना संभव नहीं हो पाती।

आगे की राह

हरगिला संरक्षण की यह कहानी भारत के अन्य लुप्तप्राय वन्यजीवों के लिए एक मॉडल बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, सांस्कृतिक धारणाओं को वैज्ञानिक तथ्यों से जोड़कर बदलने की यह रणनीति देश के अन्य क्षेत्रों में भी अपनाई जा सकती है, जहाँ मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह केवल 'मन की बात' की एक प्रेरक कहानी बनकर रह जाएगी। भारत में दर्जनों प्रजातियाँ सांस्कृतिक पूर्वाग्रह और वास-स्थान के नुकसान के दोहरे संकट में हैं — हरगिला की सफलता उनके लिए एक परीक्षित रास्ता है, बशर्ते इसे संसाधन और नीतिगत समर्थन मिले।
RashtraPress
28 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरगिला पक्षी क्या है और यह कहाँ पाया जाता है?
हरगिला (ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क) दुनिया की सबसे दुर्लभ और विशाल सारस प्रजातियों में से एक है, जो मुख्य रूप से असम और कंबोडिया के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। वैश्विक आबादी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले असम में निवास करता है।
PM मोदी ने मन की बात में हरगिला का जिक्र क्यों किया?
PM मोदी ने 28 जून 2026 को मन की बात के 135वें एपिसोड में हरगिला की संरक्षण गाथा को सामूहिक जागरूकता और महिला भागीदारी के प्रेरक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कैसे एक अशुभ माने जाने वाले पक्षी को समुदाय के प्रयासों से गाँवों की पहचान बनाया गया।
पूर्णिमा देवी बर्मन ने हरगिला संरक्षण में क्या भूमिका निभाई?
जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन ने स्थानीय महिलाओं से संवाद कर वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर हरगिला के पर्यावरणीय महत्व को समझाया। उनके नेतृत्व में महिलाओं ने एक जन-अभियान चलाया, जिसने इस पक्षी की छवि को अशुभ से गर्व के प्रतीक में बदल दिया।
हरगिला पर्यावरण के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
हरगिला एक मृतभक्षी (स्कैवेंजर) पक्षी है जो सड़े-गले मांस और मृत जीवों को खाकर प्राकृतिक सफाईकर्मी की भूमिका निभाता है। यह आर्द्रभूमि और जलाशयों के पारिस्थितिकी तंत्र को स्वच्छ और संतुलित बनाए रखने में अहम योगदान देता है।
हरगिला के नाम का अर्थ क्या है?
हरगिला नाम संस्कृत के दो शब्दों — 'हड' (हड्डी) और 'गिला' (निगलना) — से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'हड्डी निगलने वाला पक्षी'। यह नाम इस पक्षी की स्कैवेंजर प्रकृति को दर्शाता है।
राष्ट्र प्रेस
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