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PM मोदी ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति को दिया हिमरू सिल्क का तोहफा, संभाजीनगर की विरासत को मिली वैश्विक पहचान

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PM मोदी ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति को दिया हिमरू सिल्क का तोहफा, संभाजीनगर की विरासत को मिली वैश्विक पहचान

सारांश

PM मोदी ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति को संभाजीनगर की 700 साल पुरानी हिमरू हस्तकला का तोहफा देकर इसे वैश्विक मंच पर पहुँचाया। हिमरू कारीगर इमरान कुरैशी के अनुसार यह पूरी तरह हस्तनिर्मित कला है, जिसका एकमात्र असली स्वरूप उनके पास सुरक्षित है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने स्लोवाकिया दौरे में राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी को हिमरू सिल्क टाई , थेवा मोटिफ कफलिंक , पॉकेट स्क्वायर और पीतल का डोकरा एंटीलोप सेट भेंट किए।
हिमरू छत्रपति संभाजीनगर की 14वीं शताब्दी से चली आ रही पूर्णतः हस्तनिर्मित बुनाई कला है।
1 मीटर हिमरू कपड़ा बुनने में 6-7 दिन लगते हैं; दो कारीगर मिलकर 2 मीटर की शॉल तैयार करते हैं।
हिमरू फैक्टरी संचालक इमरान कुरैशी के पास 500 से अधिक मूल खिमखाप पैटर्न सुरक्षित हैं।
कुरैशी महिलाओं को प्रशिक्षण देकर इस विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में फ्रांस और स्लोवाकिया दौरे के दौरान स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी को छत्रपति संभाजीनगर की ऐतिहासिक हिमरू कला पर आधारित उपहार भेंट किए — जिनमें हाथ से बने थेवा मोटिफ कफलिंक, हिमरू सिल्क टाई, पॉकेट स्क्वायर और पीतल का डोकरा एंटीलोप सेट शामिल थे। इस घटना को हिमरू बुनकर समुदाय ने एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में देखा है, जिसने सदियों पुरानी इस हस्तकला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया।

हिमरू कारीगर की प्रतिक्रिया

हिमरू फैक्टरी के संचालक इमरान कुरैशी ने कहा, 'हमारे देश के लिए गर्व की बात है कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति को हिमरू का तोहफा दिया।' उन्होंने कहा कि आज हिमरू बहुत आगे निकल चुका है और इस पहचान से पूरे बुनकर समुदाय को अपार खुशी और गर्व महसूस हो रहा है।

हिमरू बुनाई की अनूठी तकनीक

कुरैशी के अनुसार, हिमरू पूरी तरह हैंडलूम पर तैयार होता है — इसमें कोई मशीनरी या जैक्वार्ड मशीन का उपयोग नहीं होता। दो कारीगर मिलकर 2 मीटर की एक शॉल तैयार करते हैं, जबकि 1 मीटर कपड़ा बुनने में 6 से 7 दिन का समय लगता है। उन्होंने दावा किया कि उनके पास जो तकनीक है, वह न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में किसी और के पास उपलब्ध नहीं है।

हिमरू के डिजाइनों में फारसी मोटिफ्स की प्रधानता है। इसके अलावा तोते, फूल, गुलाब, बेल और अजंता से प्रेरित डिजाइन भी शामिल हैं, जिन्हें कुरैशी के पिता ने इस कला में जोड़ा था। एक विशेष पैटर्न — 'मुगल-ए-आजम' — दिवंगत फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार के लिए बनवाया गया था।

हिमरू का ऐतिहासिक सफर

कुरैशी ने बताया कि हिमरू की जड़ें खिमखाप में हैं, जो परसिया (ईरान) से भारत आई। उनके पूर्वज मुहम्मद हुसैन और मुहम्मद याकूब कुरैशी 14वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन तुगलक के साथ दिल्ली आए थे। प्रारंभ में खिमखाप शाही परिवारों के लिए शुद्ध रेशम, साटन, मखमल, सोने और चांदी के धागों से बनाया जाता था। कालांतर में इसे सूती और रेशम के मिश्रण में आम लोगों के लिए तैयार किया जाने लगा और इसका नाम 'हिमरू' पड़ा — जो एक फारसी शब्द है और जिसका अर्थ है 'मेरे जैसा', यानी खिमखाप की प्रतिकृति। कुरैशी के पास अभी भी 500 से अधिक मूल खिमखाप पैटर्न सुरक्षित हैं।

विरासत को जीवित रखने की कोशिश

कुरैशी ने बताया कि वे इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए सक्रिय रूप से प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं। अखबारों में विज्ञापन देकर महिलाओं को हिमरू बुनाई की विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है। उनका मानना है कि हिमरू के असली डिजाइन और बुनाई की तकनीक दुनिया में अन्यत्र उपलब्ध नहीं है, और यदि इसे मशीन पर बनाया जाए तो वह नकली होगा। प्रधानमंत्री मोदी के इस कदम ने हिमरू की वैश्विक पहचान को नई ऊँचाई दी है और इस प्राचीन कला के संरक्षण को एक नई प्रेरणा मिली है।

संपादकीय दृष्टिकोण

असली सवाल यह है कि क्या यह राजनयिक प्रदर्शन ज़मीनी स्तर पर हिमरू बुनकरों की आजीविका में कोई ठोस बदलाव लाएगा — या यह केवल एक सुर्खी तक सीमित रहेगा। GI टैग और सरकारी संरक्षण की नीतियाँ तभी सार्थक होती हैं जब बाज़ार तक पहुँच और उचित मूल्य सुनिश्चित हो।
RashtraPress
9 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति को क्या उपहार दिए?
PM मोदी ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी को हाथ से बने थेवा मोटिफ कफलिंक, हिमरू सिल्क टाई, पॉकेट स्क्वायर और पीतल का डोकरा एंटीलोप सेट भेंट किए। ये सभी उपहार छत्रपति संभाजीनगर की पारंपरिक हस्तकला पर आधारित हैं।
हिमरू कला क्या है और यह कहाँ से आई?
हिमरू एक पूर्णतः हस्तनिर्मित बुनाई कला है जो छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व औरंगाबाद) में प्रचलित है। इसकी उत्पत्ति 14वीं शताब्दी में फारस से आई 'खिमखाप' कला से हुई, जिसे मुहम्मद बिन तुगलक के साथ आए कारीगरों ने भारत में विकसित किया। 'हिमरू' फारसी शब्द है जिसका अर्थ है 'मेरे जैसा'।
हिमरू बुनाई में कितना समय लगता है?
हिमरू पूरी तरह मैनुअल प्रक्रिया से बनता है — 1 मीटर कपड़ा तैयार करने में 6 से 7 दिन लगते हैं। दो कारीगर मिलकर 2 मीटर की शॉल बुनते हैं और इसमें किसी भी प्रकार की मशीनरी या जैक्वार्ड मशीन का उपयोग नहीं होता।
इमरान कुरैशी कौन हैं और हिमरू से उनका क्या संबंध है?
इमरान कुरैशी संभाजीनगर में हिमरू फैक्टरी के संचालक हैं और इस कला के परंपरागत वाहक हैं। उनके पूर्वज 14वीं शताब्दी में इस कला को भारत लाए थे और उनके पास अभी भी 500 से अधिक मूल खिमखाप पैटर्न सुरक्षित हैं।
हिमरू की विरासत को आगे कैसे बढ़ाया जा रहा है?
इमरान कुरैशी अखबारों में विज्ञापन देकर महिलाओं को हिमरू बुनाई का प्रशिक्षण दे रहे हैं ताकि यह कला अगली पीढ़ी तक पहुँच सके। PM मोदी द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किए जाने के बाद इस हस्तकला को नई वैश्विक पहचान मिली है।
राष्ट्र प्रेस
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