नर्मदा जल विवाद सुलझा: मध्य प्रदेश गुजरात को देगा ₹217 करोड़, दशकों पुराना मामला खत्म
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश सरकार दशकों पुराने नर्मदा जल विवाद में अंतिम समझौते के तहत गुजरात को एकमुश्त ₹217 करोड़ का भुगतान करेगी। 8 जुलाई 2026 को भोपाल में मंत्रिपरिषद की बैठक के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने यह जानकारी दी। यह समझौता मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच लंबे समय से चले आ रहे पुनर्वास लागत-बंटवारे के विवाद का पटाक्षेप करता है।
समझौते की मुख्य शर्तें
केंद्रीय मंत्रालय की मध्यस्थता में नई दिल्ली में हुई बैठक के बाद तय हुआ कि गुजरात पुनर्वास लागत का 75 प्रतिशत वहन करेगा — जो पहले 50 प्रतिशत तय था। इससे मध्य प्रदेश का वित्तीय बोझ घटकर ₹217 करोड़ रह गया, जबकि पहले यह लगभग ₹1,500 करोड़ था। अंतिम समझौते के तहत पुराने बकाये को बड़े पैमाने पर माफ किया गया या पुनर्गठित किया गया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 1979 में गठित नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने अपना फैसला सुनाया था, जिसमें बाँध से लाभान्वित राज्य — विशेषकर गुजरात — को ऊपरी तटवर्ती राज्यों में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और बसावट की लागत का बड़ा हिस्सा उठाने का निर्देश था। सरदार सरोवर बाँध गुजरात में स्थित है, परंतु इसके जलाशय से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की भूमि जलमग्न होती है। इसी कारण लागत-बंटवारे को लेकर विवाद दशकों तक अनसुलझा रहा। मध्य प्रदेश ने ऐतिहासिक रूप से डूब-प्रभाव के मुआवजे के रूप में लगभग ₹7,669 करोड़ की माँग की थी।
केंद्र सरकार की भूमिका
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल का इस विवाद में हस्तक्षेप के लिए आभार व्यक्त किया। फरवरी 2026 में भारत के अटॉर्नी जनरल की राय ने पुनर्वास लागत-बंटवारे को लेकर एक स्पष्ट कानूनी आधार दिया, जिसके बाद वार्ता को निर्णायक दिशा मिली। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री चैतन्य कुमार कश्यप ने बताया कि मंत्रिपरिषद को इस समझौते की विस्तृत जानकारी दी गई।
अन्य राज्यों की स्थिति
राजस्थान, जिसे नर्मदा के जल से सिंचाई और कृषि विकास का लाभ मिला है, उसने भी इस व्यापक समझौते के तहत लागत-बंटवारे के अपने दायित्वों का निपटान कर लिया है। गुजरात अब परियोजना से जुड़े किसी भी लंबित मुकदमे के बोझ के बिना आगे बढ़ सकेगा। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार अंतर-राज्यीय जल विवादों के त्वरित समाधान पर ज़ोर दे रही है।
आगे की राह
एकमुश्त ₹217 करोड़ के भुगतान के बाद सभी लंबित आपसी दायित्व समाप्त हो जाएंगे। यह समझौता भविष्य के अंतर-राज्यीय जल विवादों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जहाँ केंद्रीय मध्यस्थता और अटॉर्नी जनरल की राय ने गतिरोध तोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई।