8 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

नर्मदा जल विवाद सुलझा: मध्य प्रदेश गुजरात को देगा ₹217 करोड़, दशकों पुराना मामला खत्म

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
नर्मदा जल विवाद सुलझा: मध्य प्रदेश गुजरात को देगा ₹217 करोड़, दशकों पुराना मामला खत्म

सारांश

दशकों से अटका नर्मदा जल विवाद आखिरकार सुलझ गया। मध्य प्रदेश पर पहले ₹1,500 करोड़ का बोझ था, जो अब घटकर ₹217 करोड़ रह गया — क्योंकि गुजरात ने 75% लागत वहन करना स्वीकार किया। केंद्र सरकार की सक्रिय मध्यस्थता और अटॉर्नी जनरल की राय ने यह गतिरोध तोड़ा।

मुख्य बातें

मध्य प्रदेश दशकों पुराने नर्मदा जल विवाद के अंतिम निपटान में गुजरात को एकमुश्त ₹217 करोड़ का भुगतान करेगा।
पहले मध्य प्रदेश पर लगभग ₹1,500 करोड़ का बोझ था; गुजरात अब 75% लागत वहन करेगा, जो पहले 50% था।
फरवरी 2026 में भारत के अटॉर्नी जनरल की राय के बाद समाधान की राह खुली।
मध्य प्रदेश ने ऐतिहासिक रूप से डूब-प्रभाव मुआवजे के रूप में ₹7,669 करोड़ की माँग की थी।
राजस्थान ने भी इस व्यापक समझौते के तहत अपने लागत-बंटवारे के दायित्व निपटा लिए।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने PM मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल का आभार व्यक्त किया।

मध्य प्रदेश सरकार दशकों पुराने नर्मदा जल विवाद में अंतिम समझौते के तहत गुजरात को एकमुश्त ₹217 करोड़ का भुगतान करेगी। 8 जुलाई 2026 को भोपाल में मंत्रिपरिषद की बैठक के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने यह जानकारी दी। यह समझौता मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच लंबे समय से चले आ रहे पुनर्वास लागत-बंटवारे के विवाद का पटाक्षेप करता है।

समझौते की मुख्य शर्तें

केंद्रीय मंत्रालय की मध्यस्थता में नई दिल्ली में हुई बैठक के बाद तय हुआ कि गुजरात पुनर्वास लागत का 75 प्रतिशत वहन करेगा — जो पहले 50 प्रतिशत तय था। इससे मध्य प्रदेश का वित्तीय बोझ घटकर ₹217 करोड़ रह गया, जबकि पहले यह लगभग ₹1,500 करोड़ था। अंतिम समझौते के तहत पुराने बकाये को बड़े पैमाने पर माफ किया गया या पुनर्गठित किया गया है।

विवाद की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 1979 में गठित नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने अपना फैसला सुनाया था, जिसमें बाँध से लाभान्वित राज्य — विशेषकर गुजरात — को ऊपरी तटवर्ती राज्यों में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और बसावट की लागत का बड़ा हिस्सा उठाने का निर्देश था। सरदार सरोवर बाँध गुजरात में स्थित है, परंतु इसके जलाशय से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की भूमि जलमग्न होती है। इसी कारण लागत-बंटवारे को लेकर विवाद दशकों तक अनसुलझा रहा। मध्य प्रदेश ने ऐतिहासिक रूप से डूब-प्रभाव के मुआवजे के रूप में लगभग ₹7,669 करोड़ की माँग की थी।

केंद्र सरकार की भूमिका

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल का इस विवाद में हस्तक्षेप के लिए आभार व्यक्त किया। फरवरी 2026 में भारत के अटॉर्नी जनरल की राय ने पुनर्वास लागत-बंटवारे को लेकर एक स्पष्ट कानूनी आधार दिया, जिसके बाद वार्ता को निर्णायक दिशा मिली। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री चैतन्य कुमार कश्यप ने बताया कि मंत्रिपरिषद को इस समझौते की विस्तृत जानकारी दी गई।

अन्य राज्यों की स्थिति

राजस्थान, जिसे नर्मदा के जल से सिंचाई और कृषि विकास का लाभ मिला है, उसने भी इस व्यापक समझौते के तहत लागत-बंटवारे के अपने दायित्वों का निपटान कर लिया है। गुजरात अब परियोजना से जुड़े किसी भी लंबित मुकदमे के बोझ के बिना आगे बढ़ सकेगा। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार अंतर-राज्यीय जल विवादों के त्वरित समाधान पर ज़ोर दे रही है।

आगे की राह

एकमुश्त ₹217 करोड़ के भुगतान के बाद सभी लंबित आपसी दायित्व समाप्त हो जाएंगे। यह समझौता भविष्य के अंतर-राज्यीय जल विवादों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जहाँ केंद्रीय मध्यस्थता और अटॉर्नी जनरल की राय ने गतिरोध तोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि मध्य प्रदेश ने ₹7,669 करोड़ की माँग से शुरू होकर ₹217 करोड़ पर समझौता क्यों किया — और क्या डूब-प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा मिल चुका है। 1979 के न्यायाधिकरण के फैसले के बावजूद चार दशकों तक विवाद अनसुलझा रहना यह दर्शाता है कि अंतर-राज्यीय जल विवादों में राजनीतिक इच्छाशक्ति कानूनी आदेशों से अधिक निर्णायक होती है। केंद्र की मध्यस्थता की सराहना होनी चाहिए, परंतु पारदर्शी सार्वजनिक लेखा-जोखा — कि किसे माफी मिली और क्यों — अभी भी अपेक्षित है।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नर्मदा जल विवाद में मध्य प्रदेश को कितना भुगतान करना होगा?
अंतिम समझौते के तहत मध्य प्रदेश सरकार गुजरात को एकमुश्त ₹217 करोड़ का भुगतान करेगी। यह राशि सभी लंबित आपसी दायित्वों के निपटान के लिए तय की गई है, जबकि पहले मध्य प्रदेश पर लगभग ₹1,500 करोड़ का बोझ था।
नर्मदा जल विवाद की शुरुआत कब और क्यों हुई?
नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन 1979 में हुआ था, जब सरदार सरोवर बाँध परियोजना से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की भूमि जलमग्न होने लगी। न्यायाधिकरण के फैसले के बावजूद भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और लागत-बंटवारे को लेकर विवाद दशकों तक बना रहा।
इस समझौते में केंद्र सरकार की क्या भूमिका रही?
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की मध्यस्थता में नई दिल्ली में बैठक हुई, जिसमें यह समझौता तय हुआ। फरवरी 2026 में भारत के अटॉर्नी जनरल की राय ने लागत-बंटवारे का कानूनी आधार स्पष्ट किया, जिसके बाद वार्ता को निर्णायक दिशा मिली।
गुजरात को इस समझौते से क्या लाभ होगा?
गुजरात अब परियोजना से जुड़े सभी लंबित मुकदमों और दायित्वों से मुक्त होकर आगे बढ़ सकेगा। बाँध परियोजना का मुख्य लाभार्थी होने के नाते गुजरात ने 75% लागत वहन करना स्वीकार किया, जिससे दशकों का कानूनी गतिरोध समाप्त हुआ।
राजस्थान और महाराष्ट्र की इस समझौते में क्या स्थिति है?
राजस्थान ने भी इस व्यापक समझौते के तहत लागत-बंटवारे के अपने दायित्व निपटा लिए हैं। समाचार के अनुसार, यह समझौता चारों राज्यों — मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान — के बीच के सभी लंबित वित्तीय विवादों का समाधान करता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 21 घंटे पहले
  2. 1 सप्ताह पहले
  3. 1 सप्ताह पहले
  4. 1 सप्ताह पहले
  5. 1 सप्ताह पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 3 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले