मुकेश चंद माथुर की 103वीं जयंती: 'दोस्त-दोस्त न रहा' से अमर हुई वो आवाज जो आज भी दिलों में बसती है
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के अमर पार्श्वगायक मुकेश चंद माथुर की 22 जुलाई 2026 को 103वीं जयंती है। 22 जुलाई 1923 को जन्मे मुकेश ने अपनी सुरीली आवाज से हिंदी संगीत जगत में एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी जो सात दशक बाद भी देशभर के संगीत प्रेमियों के दिलों में उतनी ही ताज़ी है। 'दोस्त-दोस्त न रहा', 'आवारा हूं' और 'मेरा जूता है जापानी' जैसे गीत आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुनगुनाए जाते हैं।
प्रारंभिक जीवन और संगीत की राह
मुकेश का पूरा नाम मुकेश चंद माथुर था। उनके पिता जोरावर चंद माथुर पेशे से इंजीनियर थे। दस भाई-बहनों में मुकेश अपने माता-पिता की छठी संतान थे। बचपन से ही गायन के प्रति उनका अनुराग गहरा था — वे अपने सहपाठियों को अक्सर गाना सुनाया करते थे। दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़कर उन्होंने नौकरी शुरू की, लेकिन संगीत का आकर्षण उन्हें खींचता रहा।
फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश का किस्सा
मुकेश के करियर की नींव एक शादी समारोह में रखी गई। वे अपने रिश्तेदार अभिनेता मोतीलाल की बहन के विवाह में गाना गा रहे थे, जब मोतीलाल उनकी आवाज से अभिभूत हो गए। मुंबई लौटने के बाद मोतीलाल ने मुकेश को पेशेवर गायन की विधिवत ट्रेनिंग दिलाई। उनके पहले गाने 'दिल ही बुझा हुआ हो तो' ने ही श्रोताओं के बीच उनकी विशेष पहचान बना दी। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी फिल्म संगीत का स्वर्णिम युग अपनी शुरुआत कर रहा था।
गायकी के साथ परदे पर भी जमाया रंग
मुकेश केवल पार्श्वगायक नहीं थे — उन्होंने 'माशूका', 'आह', 'अनुराग' और 'दुल्हन' जैसी फिल्मों में अभिनेता के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। गौरतलब है कि उस दौर में गायक और अभिनेता की भूमिकाएँ एक साथ निभाना बेहद दुर्लभ था, और मुकेश ने दोनों मोर्चों पर अपनी प्रतिभा साबित की।
यादगार गीत और विरासत
अपने 40 वर्ष के लंबे करियर में मुकेश ने 200 से अधिक गीत गाए। 'दोस्त-दोस्त न रहा', 'जीना यहाँ मरना यहाँ', 'कहता है जोकर', 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई', 'आवारा हूं' और 'मेरा जूता है जापानी' उनकी उन रचनाओं में शामिल हैं जो हिंदी सिनेमा की सांस्कृतिक धरोहर बन चुकी हैं। वे भारत ही नहीं, विदेशों में भी व्यापक रूप से लोकप्रिय रहे।
अंतिम सफर और अमर विरासत
27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो के दौरान मुकेश को दिल का दौरा पड़ा। उस वक्त वे 'इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल' गीत प्रस्तुत कर रहे थे — और मानो उन्हीं बोलों ने उनके जाने के बाद भी अपनी सच्चाई साबित कर दी। उनकी आवाज आज भी रेडियो, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और संगीत सभाओं में उतनी ही जीवंत है जितनी उनके जीवनकाल में थी।