17 अगस्त 2026
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'वंदे मातरम' पर हुसैन दलवई की अपील: मुसलमान सम्मान दें, बोलने की बाध्यता नहीं

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'वंदे मातरम' पर हुसैन दलवई की अपील: मुसलमान सम्मान दें, बोलने की बाध्यता नहीं

सारांश

'वंदे मातरम' को सम्मान दो, बोलने की बाध्यता नहीं — कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने मुंबई में यह स्पष्ट संदेश दिया। सोनिया गांधी के रुख का समर्थन करते हुए उन्होंने अनिवार्यता कानून को गलत बताया और 2029 चुनाव से पहले सामाजिक दरार की चेतावनी दी।

मुख्य बातें

कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने 17 अगस्त को मुंबई में 'वंदे मातरम' विवाद पर अपनी राय रखी।
दलवई ने मुसलमानों से 'वंदे मातरम' का सम्मान करने की अपील की, लेकिन इसे बोलने की बाध्यता का विरोध किया।
रवींद्रनाथ ठाकुर ने 1885 में कांग्रेस अधिवेशन में केवल दो स्टैंजा को मान्यता देने की बात कही थी — यह परंपरा तब से चली आ रही है।
दलवई ने सोनिया गांधी के रुख का समर्थन किया और 'वंदे मातरम' अनिवार्यता कानून को गलत बताया।
उन्होंने 2029 चुनाव से पहले भाजपा द्वारा सामाजिक दरार पैदा करने की कोशिश की चेतावनी दी।
एकनाथ शिंदे के कांग्रेस में शामिल होने की इच्छा का खुलासा किया — ठाणे व पालघर साथ लाने का प्रस्ताव था, पर पार्टी विरोध के कारण नहीं हो सका।

कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने 17 अगस्त को मुंबई में 'वंदे मातरम' विवाद, सोनिया गांधी के रुख और महबूबा मुफ्ती के बयान सहित कई संवेदनशील मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी। दलवई ने मुसलमानों से अपील की कि वे 'वंदे मातरम' को सम्मान दें, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इसे बोलने की कोई बाध्यता नहीं होनी चाहिए।

वंदे मातरम पर दलवई का रुख

हुसैन दलवई ने कहा कि 'वंदे मातरम' मूलतः बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास में लिखा गया था। उन्होंने बताया कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने 1885 में कांग्रेस के अधिवेशन में कहा था कि इसके केवल दो स्टैंजा को मान्यता देनी चाहिए और उतना ही गाया जाना चाहिए — तब से यही परंपरा चली आ रही है। दलवई ने अपनी धार्मिक उदारता का उदाहरण देते हुए कहा, 'मैं गणपति की पूजा के लिए जाता हूँ, गाँव के मंदिर में भी जाता हूँ — मुझे कोई आपत्ति नहीं।' उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे 'वंदे मातरम' का सम्मान करें, परंतु उन्हें इसे बोलने के लिए बाध्य न किया जाए।

सोनिया गांधी के रुख का समर्थन

दलवई ने सोनिया गांधी के 'वंदे मातरम' संबंधी रुख का पुरज़ोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि 'वंदे मातरम' को अनिवार्य बनाने वाला कानून गलत है और कांग्रेस को इस मुद्दे पर सोनिया गांधी के साथ खड़े रहना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विरोध का अर्थ हिंदू-विरोध नहीं है। दलवई ने कहा कि 'वंदे मातरम' के नारे से ही लोगों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम लड़ा था, इसलिए इसे सांप्रदायिक रंग देना ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अन्याय है। उन्होंने सोनिया गांधी को 'हिम्मत वाली महिला' बताया।

भाजपा पर निशाना और 2029 की चेतावनी

दलवई ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर आरोप लगाया कि वह राजनीतिक लाभ के लिए 'वंदे मातरम' जैसे भावनात्मक मुद्दे उठा रही है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी और विपक्ष की ओर से जो चुनौती खड़ी की गई है, उसका जवाब देने के लिए भाजपा के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है। दलवई ने 2029 के चुनाव को लेकर आगाह किया कि सामाजिक दरार और फसाद पैदा कर चुनाव जीतने की कोशिश की जाएगी। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में 'वंदे मातरम' अनिवार्यता को लेकर राजनीतिक बहस तेज़ हो गई है।

अन्य मुद्दों पर दलवई की राय

बाबा रामदेव के बयान पर दलवई ने कहा कि उन्होंने पहली बार छात्रों के हित की बात की है, जिसका स्वागत होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि रामदेव को समझना चाहिए कि छात्र सड़कों पर क्यों उतरे।

कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण के गोपीनाथ मुंडे संबंधी बयान पर दलवई ने कहा कि चव्हाण की बात सही है — मुंडे कांग्रेस में शामिल होना चाहते थे, लेकिन अहमद पटेल की शर्त के कारण वे नहीं आए। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि एकनाथ शिंदे ने जब पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री थे, तब कांग्रेस में आने की इच्छा जताई थी और ठाणेपालघर जिले साथ लाने का प्रस्ताव दिया था, परंतु पार्टी के भीतर विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका।

महाराष्ट्र में मराठी भाषा की अनिवार्यता पर दलवई ने कहा कि गरीब मजदूरों पर भाषा थोपना उचित नहीं है और यह जानबूझकर गरीब-विरोधी कदम है।

आगे क्या

'वंदे मातरम' अनिवार्यता पर राजनीतिक बहस आगामी दिनों में और तेज़ होने की संभावना है। दलवई के बयान ने कांग्रेस के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर चर्चा को नई दिशा दी है — विशेष रूप से 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की चुनौती के संदर्भ में।

संपादकीय दृष्टिकोण

दूसरी तरफ अनिवार्यता कानून का विरोध। लेकिन मुख्यधारा की कवरेज जो नज़रअंदाज़ करती है वह यह है कि कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे पर एकमत नहीं है — दलवई की उदारवादी लाइन और पार्टी की आधिकारिक स्थिति के बीच की खाई अभी भी स्पष्ट नहीं है। एकनाथ शिंदे और गोपीनाथ मुंडे से जुड़े खुलासे राजनीतिक रूप से अधिक विस्फोटक हैं, लेकिन 'वंदे मातरम' की सुर्खियों में दब गए। 2029 के चुनाव से पहले यह बहस केवल प्रतीकात्मक नहीं रहेगी — यह मतदाता ध्रुवीकरण का औज़ार बन सकती है।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हुसैन दलवई ने 'वंदे मातरम' पर मुसलमानों से क्या अपील की?
कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने मुसलमानों से अपील की कि वे 'वंदे मातरम' का सम्मान करें, लेकिन उन्हें इसे बोलने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर की 1885 की परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि केवल दो स्टैंजा को मान्यता दी जानी चाहिए।
'वंदे मातरम' अनिवार्यता कानून पर कांग्रेस का क्या रुख है?
हुसैन दलवई ने स्पष्ट किया कि 'वंदे मातरम' को अनिवार्य बनाने वाला कानून गलत है और कांग्रेस को सोनिया गांधी के रुख के साथ खड़े रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस विरोध का अर्थ हिंदू-विरोध नहीं है।
दलवई ने एकनाथ शिंदे के बारे में क्या खुलासा किया?
हुसैन दलवई ने बताया कि जब पृथ्वीराज चव्हाण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे, तब एकनाथ शिंदे ने कांग्रेस में शामिल होने की इच्छा जताई थी और ठाणे व पालघर जिले साथ लाने का प्रस्ताव दिया था। पार्टी के भीतर विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका।
दलवई ने 2029 चुनाव को लेकर क्या चेतावनी दी?
दलवई ने आगाह किया कि भाजपा 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सामाजिक दरार और फसाद पैदा कर सकती है। उनके अनुसार, विपक्ष की मजबूत चुनौती का जवाब देने के लिए भाजपा के पास ठोस मुद्दे नहीं हैं, इसलिए भावनात्मक मुद्दे उठाए जा रहे हैं।
गोपीनाथ मुंडे के कांग्रेस में शामिल होने पर दलवई ने क्या कहा?
दलवई ने कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण के बयान की पुष्टि करते हुए कहा कि गोपीनाथ मुंडे कांग्रेस में आने के लिए तैयार थे। उन्होंने बताया कि अहमद पटेल ने शर्त रखी थी कि पहले मुंडे इस्तीफा दें और चुनाव जीतकर आएँ, जिसके कारण वे नहीं आए।
राष्ट्र प्रेस
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