पूजा-स्थलों पर शालीन वस्त्र पहनें महिलाएं: मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने किया इस्कॉन ड्रेस कोड का समर्थन
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने 11 अगस्त 2026 को वृंदावन के इस्कॉन मंदिर द्वारा लागू किए गए ड्रेस कोड का समर्थन करते हुए देश की सभी महिलाओं से अपील की कि वे किसी भी धर्म के पूजा-स्थल पर जाते समय शालीन और पूरे शरीर को ढकने वाले वस्त्र पहनें। उन्होंने इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा की रक्षा से जोड़ा।
मौलाना का बयान: भारतीय परंपरा की दुहाई
मुस्लिम धर्मगुरु ने कहा, 'सिर्फ इस्कॉन मंदिरों में ही नहीं, बल्कि भारत की सभी धार्मिक जगहों पर — चाहे वे गुरुद्वारे हों, चर्च हों या दरगाहें — महिलाओं को पूरे शरीर को ढकने वाले और शालीन कपड़े पहनने चाहिए। यही भारत की संस्कृति और हमारी परंपरा है।' उन्होंने आगे कहा कि शरीर दिखाने वाले कपड़े यूरोपीय संस्कृति की देन हैं और इन्हें अपनाना भारतीय मूल्यों से दूर होना है।
मौलाना रजवी बरेलवी के अनुसार, 'जब भी महिलाएं किसी धार्मिक स्थल पर जाएं — चाहे दरगाह हो या मंदिर — तो उन्हें उस स्थान की पवित्रता और गरिमा का पूरा सम्मान करना चाहिए।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब धार्मिक स्थलों पर आचार-संहिता को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है।
इस्कॉन मंदिर का ड्रेस कोड: क्या हैं नियम
वृंदावन स्थित इस्कॉन मंदिर — जो भगवान कृष्ण से जुड़े सर्वाधिक पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है — के प्रबंधन ने भक्तों के लिए शालीन वस्त्र पहनना अनिवार्य कर दिया है। छोटे या अशोभनीय कपड़ों पर सख्त प्रतिबंध लगाया गया है। मंदिर प्रशासन ने प्रवेश द्वारों पर नोटिस बोर्ड लगाए हैं, जिनमें ड्रेस कोड के साथ-साथ फोटोग्राफी और अन्य आचरण संबंधी दिशानिर्देश भी दर्ज हैं।
अन्य धार्मिक हस्तियों की प्रतिक्रिया
रामदल ट्रस्ट के अध्यक्ष कल्कि राम ने भी ड्रेस कोड की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि लोग मंदिरों में ऐसे कपड़े पहनकर आते हैं जो शालीनता के मानकों के अनुरूप नहीं होते। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस्कॉन मंदिर को अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली में भी सुधार की ज़रूरत है।
संत सत्येंद्र दास वेदांती ने भी इस कदम का स्वागत किया और सुझाव दिया कि पूरे देश के धार्मिक स्थलों पर इसी तरह के नियम लागू होने चाहिए।
व्यापक संदर्भ: धार्मिक स्थलों पर आचार-संहिता की बहस
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब देश के धार्मिक स्थलों पर वस्त्र-संहिता को लेकर चर्चा हुई हो। केरल के कई मंदिरों से लेकर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर तक, विभिन्न धार्मिक संस्थाएं वर्षों से श्रद्धालुओं के लिए आचरण-नियम लागू करती रही हैं। इस्कॉन का यह निर्णय उसी परंपरा की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नियम धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखने में सहायक होते हैं, बशर्ते इन्हें सम्मानजनक तरीके से लागू किया जाए।
मौलाना रजवी बरेलवी का यह बयान अंतर-धार्मिक सहमति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है, जहाँ एक मुस्लिम धर्मगुरु ने हिंदू मंदिर की नीति का खुलकर समर्थन किया। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अन्य धार्मिक संस्थाएं इस पहल को किस रूप में अपनाती हैं।